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shaily Tripathi

Children Stories Action

4  

shaily Tripathi

Children Stories Action

बच्चे बन जाते हैं (Day 14)

बच्चे बन जाते हैं (Day 14)

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आओ इस मौसम का लुत्फ उठाते हैं, 

चलो आज हम सब भी बच्चे बन जाते हैं, 

कुछ देर ही सही, खेल-कूद आते हैं 

पापा की डाँट का डर अब नहीं है 

चलो साथ दूर तक दौड़ लगा आते हैं 

आओ इस पुलिया पर बैठ कर सुस्ताते हैं 

भूले से बचपन में गोते लगाते हैं… 

सूखे हैं, पीले हैं और कुछ हरे-हरे 

पेड़ों से गिरे हुए पत्ते उठाते हैं 

साँसों में मिट्टी की भूली सुगन्ध भर  

बीत गये बचपन को फिर से जी लेते हैं 

नाम-बाँत, घर-बार ज़िम्मेदारी का जंजाल 

सब भूल जाते हैं, कुछ देर के लिए मस्त हो जाते हैं 

माँ ही नहीं जो डाँटेगी कपड़ों के दाग पर 

पार्क या मैदान में कूद-फाँद आते हैं

आनंद से लेट कर नर्म, हरी घास पर  

आसमां में पतंगों के दाँव-पेच देखते हैं

चिड़ियों के रंग और उड़ान देखते हैं 

सामाजिक बंधन को कुछ और ढीला कर 

ठेले पर सजी हुई लाल कुरकुरी भुनी  

नमक मिर्च डाल कर मूँगफलियाँ खाते हैं। 

कितनी ही हसरतें दिल में ही रह गयीं 

आज उन सबका हिसाब हम चुकाते हैं 

नुक्कड़ के ठेले से चाय पी आते हैं 

फेरी पर बिक रहे, डिब्बों में सजे हुए 

साबुन से झाग के बुलबुले उड़ाते हैं 

उड़ते गुब्बारों को उंगलियों में बाँध कर 

पैर की ठोकर से पत्थर लुढ़काते हैं 

घर के झमेलों को थोड़ा सा टाल कर 

डालों पर लटक रहे कुछ फल गिराते हैं 

प्यारे से सर्द-नर्म बहके से मौसम में 

साठ के दशक में भी बच्चे बन जाते हैं 



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