STORYMIRROR

अच्युतं केशवं

Others

2  

अच्युतं केशवं

Others

बौने पंख परिंदा

बौने पंख परिंदा

1 min
98

उठीं थीं आंधियाँ तब ही,

जब आहट थी बहारों की।

रुकी हर स्वप्न की डोली,

प्रतीक्षा में कहारों की।

रहा फिर भी भरोसा,

बौने पंखों पर परिंदे को।

अकीदा बन नहीं पाया कभी,

चादर मजारों की।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन