बाज़ार का जश्न
बाज़ार का जश्न
हमने सुना था,
सौंदर्य हया में बसता है,
शब्दों में रूह की आहट होती है,
हंसी में तहज़ीब की ख़ुशबू आती है।
पर अब…
सौंदर्य बिकता है,
सरेराह, सरेआम, स्क्रीन पर,
एक क्लिक पर खुलते दरवाज़ों के पीछे
जिस्म के टुकड़े तैरते हैं
और उन्हें कला कहते हैं!
अब…
शब्द ज़ख़्मी हैं,
ज़ुबान पर गालियों के फफोले हैं,
लफ्ज़ों की बेकद्री ऐसे होती है
जैसे कोई किताब को जला दे
और राख को शायरी कहे।
अब…
हंसी ठहाकों में तब्दील है,
जिनमें हरकतें बेहूदा हैं,
लतीफ़े अश्लील हैं,
जहाँ तंज़ नहीं, सिर्फ़ नंगापन है।
अब…
कहानी के नाम पर जिस्म की भूख है,
वेब सीरीज़ के सीन ऐसे
कि परछाईं भी लज़्ज़ा में डूब जाए,
सच भी आंखें फेर ले,
और पर्दे के पीछे बैठे लोग
इसे बोल्ड कहें,
और कहें— "ये तो नया दौर है!"
पर कौन पूछेगा कि,
ये दौर किसकी रूह का कत्ल कर रहा है?
ये कला नहीं,
मंडी है,
जहाँ इंसानियत का सौदा होता है,
जहाँ हया का गला घोंटा जाता है
और हम तालियाँ बजाते हैं!
क्यों?
क्योंकि हम डरते हैं
पीछे छूट जाने से,
पुराने कहे जाने से,
आज़ाद न दिखने से।
तो हमने अपनी सोच गिरवी रख दी,
अपनी ज़ुबान बेच दी,
अपनी रूह का सौदा कर लिया।
अब बाज़ार में हर चीज़ बिकाऊ है।
इज़्ज़त— एक कांसेप्ट है।
शर्म— एक मज़ाक है।
और हम…
हम इस तमाशे के दर्शक हैं,
जो हर रोज़ मरते हैं,
हर रोज़ ज़िंदा रहते हैं।
कभी-कभी सोचता हूँ,
जो सच में कुछ अच्छा कर रहे हैं,
जो रोशनी लिए फिरते हैं इस अंधेरे में,
उनकी आँखों में आँधियाँ क्यों भर दी जाती हैं?
वो लिखते हैं—
ज़ख़्मों की सिलाइयों पर,
सच्चाई की स्याही से,
मगर उनके लफ्ज़ जला दिए जाते हैं
क्योंकि सच देखने की हिम्मत
हर किसी में नहीं होती।
वो गाते हैं—
ख़्वाबों की मासूम धुनें,
मगर उनकी आवाज़ कुचल दी जाती है
क्योंकि इस दौर को
सिर्फ़ शोर सुनाई देता है।
वो बनाते हैं—
ऐसी तस्वीरें
जो आंखों से नहीं,
दिल से देखी जाती हैं,
मगर उन्हें दफ़्न कर दिया जाता है
क्योंकि बाज़ार में हक़ीक़त नहीं,
सिर्फ़ बिकाऊ सपनों की क़ीमत लगती है।
कभी-कभी सोचता हूँ,
ये दौर किसका है?
उनका जो जलते दीपक हैं,
या उनका जो आँधियों के सौदागर हैं?
शायद…
जो रौशनी लाते हैं,
वही सबसे पहले अंधेरे में धकेल दिए जाते हैं।
