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पापड़ी
पापड़ी
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© Vikas Bhanti

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मोहल्ले में तितर बितर भागते पापड़ी को कभी तो लोग पास बिठाते, तो कभी दुत्कार कर भगा भी देते थे। कभी वो बड़े ज्ञान की बातें करता तो कभी बस यूँ ही आसमान की तरफ देख कर गालियाँ बका करता, कभी पत्ते लपेट लेता तो कभी पहने हुए हर एक कपड़े को उतार तार तार कर देता। लोग बोलते थे कि पागल है बेचारा।

कहाँ से आया था, किसी को पता नहीं, असल नाम भी नहीं पता था, बस हलवाई की दुकान से मुफ्त की पापड़ी मांगने की आदत ने उसका नाम पापड़ी रख दिया। धूप में जला चेहरा, बड़े बड़े जड़ीले से बाल, बेतरतीब दाढ़ी और तम्बाकू से पीले पड़े हुए दांत। घर के सामने पड़े कूड़े का ढेर उसका घर था और लोगों के घर का बासी खाना उसका पेट पालने का जरिया ।


"ओ पापड़ी, इधर आ।", कोयले की टपरी चलाने वाले गुप्ता जी ने उसे आवाज़ लगाई।

पापड़ी भी बच्चों सा कूदता चला आया और अपनी अजीब सी हँसी की फुहार छोड़ दी।

"अबे पगले, दूर हट।" गुप्ता जी झल्लाए। पापड़ी कुछ ज्यादा ही करीब आ गया था। "ये बता तू आया कहाँ से है ?"

"मैं आसमान में रहता था, भगवान जी ने धक्का देकर यहाँ फेंक दिया। यहां तो खुराक भी न मिलती गोसाई जी।" पापड़ी बोला।

"अबे मंदबुद्धि, पूरे दिन में 25-30 रोटी मिल जाती हैं तुझे और गुड्डू हलवाई के यहां से मुफ्त की पापड़ी। अब क्या दही जलेबी खायेगा?" गुप्ता जी ने तंज़ कसा ।

अरे गोसाईं तुम समझे नहीं, खुराक वो वाली।" पापड़ी ने दोनों मुट्ठियों की कटोरी सी बनाई और होंठ के पास लाकर कश सा खींचा।

"अच्छा चरस गांजा " गुप्ता जी बोले।

"अरे बाबा का प्रसाद बोलो गोसाईं। जुगाड़ करा दो न जब से आसमान से गिरा हूँ प्रसाद न मिला। जुबान भी लपके मार रही।" पापड़ी बोला।

"पैसा कहाँ है तेरे पास?" गुप्ता जी बोले।

"क्या बात कर दी गोसाईं ! देख " कहते हुए पापड़ी ने एक काला मैला सा बटुआ खोल दिया। गुजले हुए 50 से लेकर 500 के नोट भरे पड़े थे भीतर।

"अबे तू तो छुपारुस्तम निकला। मैं पता बताता हूँ तू जाकर मेरा नाम ले देना माल मिल जाएगा। वो तबेला देखा है न शंकर का उसके बगल से गली गई है भीतर, बस चौथा मकान है। जाकर मेरा नाम ले देना।


पापड़ी ख़ुशी ख़ुशी गुप्ता जी के बताये ठिकाने के लिए निकल लिया। शाम को उसकी लाल आँखों ने गुप्ता जी को बता दिया कि काम हो गया है। हर शाम बम बम करता पापड़ी गुप्ता जी के चरणों में पड़ा रहने लगा। पता बताने के बदले में पापड़ी उनका छोटा मोटा काम करने लगा था। एक हफ्ता बीता था कि पापड़ी ने पैर दबाते वक़्त गुप्ता जी से कहा," गोसाईं वो मिंटू के पास माल ख़त्म हो गया है, बहुत तलब लग रही है। कोई और ठिकाना है क्या ?"


"साले चरसी, रुक सोचने दे, हाँ याद आया...चौड़ी गली में चला जा, मोनिंदर ऑटो कर के दुकान है वहां मिल जाएगा।" गुप्ता जी फिर से समाधान दाता बन कर सामने आये थे। पापड़ी को एक ठिकाना और मिल चुका था पर तीसरे दिन ही वहां मारपीट कर के फिर से गुप्ता जी की शरण में आ गया।

अब गुप्ता जी ने एक पेन पेपर निकाला और शहर के दसियों अड्डों की एक लिस्ट बना कर पापड़ी के हाथ में थमा दी ," ले पूरी लिस्ट है, अब खुद समझ, दल्ला नहीं हूँ मैं चरस का, साला खुद चरस पीता है और मुझसे पाप करवाता है, अब बार बार मुझसे ये पाप मत करवा । निकल यहां से।"


पापड़ी लिस्ट को उलटता पलटता वहां से चला गया। तीन दिन बीत गए पापड़ी लौट कर नहीं आया। गुप्ता जी को भी अब तक उससे एक लगाव सा पैदा हो गया था। चिंता में कई बार कूड़े के उस ढेर को ताकते और खुद को कोसते कि क्यों उसको भला बुरा कह सुनाया ।

कुछ ही देर में सांध्य दैनिक लिए साइकिल सवार की आवाज़ फिजाओं में गूंजी, " आज की ताज़ा खबर, आज की ताज़ा खबर, नशे के अवैध ठिकानों पर पड़ा छापा। सीआईडी अफसर किशोर तिवारी का एक और नायाब कारनामा। आज की ताज़ा खबर।"


खबर सुनते ही गुप्ता जी के कान खड़े हो गए। किशोर तिवारी प्रदेश का एक जाना माना नाम था। सैकड़ों कामयाब कारनामे थे उसके नाम पर, वसूली, किडनैपिंग, उठाई गिरी जैसे कई केसेस की कामयाबी के सितारे तिवारी जी के नाम थे। जैसे ही गुप्ता जी ने अखबार पर नज़र मारी उनके रोंगटे खड़े हो गए।

सूट बूट में सजे पापड़ी की तस्वीर और साथ में ठगे से खड़े वो नशे के तमाम तस्कर जिनकी लिस्ट खुद गुप्ता जी ने बना कर उसे दी थी।


दुकान दुत्कार चरस

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