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वसन्त
वसन्त
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© Udbhrant Sharma

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दुनिया में
तमाम तरह के दुःख हैं
पीड़ा है
त्रास है
मगर इन सबसे बेख़बर
वसन्त आ रहा है
उसे मालूम है
कि इस दुनिया के लोग
जीवन के बड़े संघर्षों में मुब्तिला हैं
तेज़ भागमभाग में
यहाँ से वहाँ
वहाँ से वहाँ
उनकी व्यस्तता मारक है
मगर वसन्त है
कि मानता नहीं
आ रहा है
उसे पता है कि
ऋतुचक्र समय से चल रहा
और अब उसे आना ही है
दुनिया
उसका स्वागत नहीं करती तो न करे
वह आता है तो
बाजे-गाजे के साथ
अपनी सेना लिये हुऐ
अपने समृद्ध साम्राज्य का
कराते अहसास
उसके आने की सूचना
उसके आगे-आगे चलती
और जब वह आता है
तो फूलों में, कलियों में,
पेड़ों की टहनियों, पत्तों तक में;
पहाड़ों पर,
रेगिस्तान में-
उसकी विजय-दुंदुभी की गूँजती महक
हमें करती है विभोर।
हमें ही नहीं
पशुओं और पक्षियों तक को!
इसलिए उसे परवाह नहीं
कि कोई उसे
निमंंत्रण देता या नहीं।
वह इसे समझता है अपना अधिकार
आता है बड़ी शान से
बहुत थोड़े समय के लिऐ
और फिर जाता है तो उसी
महाराजा की शान से!

 

वसन्त

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