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कान, आँखें, सोच, ज़ुबान
कान, आँखें, सोच, ज़ुबान
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© Ashish Aggarwal

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दूसरों की तारीफ़ सुनते ही अपने फ़ाटक बंद करते हैं,

ये कान अक्सर अपनी तारीफ़ सुनना ही पसंद करते हैं।

बारीक से बारीक आवाज़ भी सुन लेते ये कभी-२,

दूसरों के राज़ जानने के लिए ख़ुद को बुलंद करते हैं।

बहुत चालाक हो जाते अपनी अहमियत बढ़ाने के लिए,

जो बात ना सुने उसे ख़ुद से लगाकर अकलमंद करते हैं।

 

इशारों-२ में दिल में छुपी हर बात कहती हैं,

अनमोल आँखें तो सदा खूबसूरती पर फ़िदा रहती हैं।

धुँधली-२ सी होने लग जाती इनमें छुपी नज़र,

जब लम्बे अरसे से किसी के इंतेज़ार में रहती हैं।

लूट लेती हैं आशिक बनाकर अपनी इक ही झलक से,

ये पलकों की हरकत से गोलमाल-गोलमाल कहती हैं।

 

नींद में भी आँखें खुली रहती इस नादान की,

कुछ ना कुछ सोचती रहती सोच इन्सान की।

वो ही बदल सका हालात जो इसको बदल सका,

असल यही शुरूआत है हर कामयाब दास्तान की।

पाकीज़ा कर देती ये ज़िस्म से लेकर रूह तक को,

जब सब कुछ भूलाकर बावरी हो जाती रहमान की।

 

दूसरे को कुछ ग़लत कहने का मौका दे देती है,

कभी-२ अपनी ज़ुबान ही हमें धोखा दे देती है।

इसका ठीक इस्तेमाल करना भी एक जादू है,

ये चतुराई से सामने वाले को भुलेखा दे देती है।

अपनी औक़ात में रहना भी सिखाती ये,

अपने से बड़ों के आगे बोलने की रेखा दे देती है।

kaan aankhein soch zubaan

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