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गमे जिन्दगी
गमे जिन्दगी
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© Sanjeev Singh Sagar

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गमे जिन्दगी को अब

दर्दे दिल रास न आया।

बिछड़ के उनसे मेरे,

फिर कोई पास न आया।

छोड़ दी उनकी चाहत

और पाने की तमन्ना।

आज दीवाने दिल को,

बेदर्दों की महफिल में ले आया

गमे जिन्दगी को अब

दर्दे दिल रास न आया।

बैठा रहा जब आश में,

फिर क्यों न पास वो आया?

रोना छोड़कर मुस्कुराना सीखें जिन्दगी खुद राश आने लगेगी।

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