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सारा आबिदी
सारा आबिदी
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© Udbhrant Sharma

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सारा आबिदी
तुम एक ज़हीन बच्ची थीं,
ख़ुदा की नियामत,
अब्बू और अम्मी की आँखों का तारा,
अपनी क्लास की कमज़ोर बच्चों की मददगार,
अपनी टीचर्स के लिऐ क़ीमती हीरा,
पढ़ाई में अव्वल,
सबकी प्यारी!
तुम्हारे भीतर
कुछ कर गुज़रने के हौसले थे
और अब्बू और अम्मी के
बुढ़ापे के लिऐ कुछ हसीन ख़्वाब
मगर तुम्हारे ख़ुदा ने
इसकी मंज़ूरी नहीं दी
और दसवीं के इम्तेहान के बाद
महाराष्ट्र की सैर कर
सालभर की कड़ी मेहनत को
ख़ुशी में ढालने की
तुम्हारी ख़्वाहिश को बदल दिया
एक्सीडेंट के एक दर्दनाक हादसे में,
तुम्हारी अम्मी को भी
साथ तुम्हारे ही बुलाते हुऐ!
और जानते हुऐ कि
तुम्हारे अब्बू कैसे रहेंगे फिर
अकेले इस दुनिया में
और पीछे-पीछे
दौड़ पड़ेंगे ख़बर सुनते ही!
क्या तुम्हारे ख़ुदा को
इतनी मोहब्बत थी तुमसे-
कि तुम्हें बुला लिया
पन्द्रह साल की ही छोटी-सी उम्र में?
और क्या उसे पता था कि
तुम्हें अम्मी से इतनी थी मुहब्बत
कि ख़ुदा भी अकेले तुम्हें नहीं रख पाता ख़ुश?
और क्या ख़ुदा होकर भी
उसे पता नहीं था
कि अब्बू तुम्हारे तुमको ही नहीं
अपनी बेग़म को भी करते थे मुहब्बत
उससे भी ज़्यादा
जो बादशाह शाहजहाँ
करता था बेग़म से अपनी?
कैसा है तुम्हारा यह ख़ुदा जो
जान नहीं पाया कि
तुमसे मुहब्बत तो
तुम्हारे सभी संगी-साथी और टीचर भी
करते बेइन्तिहा
और कुछ दिन बाद ही
जब दसवीं के रिज़ल्ट में तुमको वे देखेंगे
उत्तीर्ण छात्रों की सूची में सबसे ऊपर तो
कलेजा करेगा उनका हाहाकार
आँसू उनके थमने पर भी थमेंगे नहीं
कैसा सूनापन वे करेंगे महसूस
नहीं रहने पर तुम्हारे?
कलेजे में लिये घाव
कोसते रहेंगे उस निर्दयी ख़ुदा को
अपने जीवनभर,
जिसने उनकी यादों को
गहरे दुख की लपटों में
झुलसाकर रख दिया!
उनको ही नहीं
मेरे जैसे उन हज़ारों और लाखों लोगों को भी
जिन्होंने नहीं तुम्हें देखा कभी, जाना नहीं-
पर तुम्हारे जाने के महीनेभर बाद ही
दसवीं के रिज़ल्ट में
तुम्हारे अव्वल आने की ख़बर पढ़कर
आँखों में बादल दिल में अंगारा लिऐ हुऐ
ग़ुस्से से भरकर
अपने ख़ुदा को अथवा ईश्वर को,
गुरु को, क्राइस्ट को
बुरा-भला कहेंगे
यह जानते हुऐ भी कि
कोई असर नहीं पड़ेगा इसका!
क्योंकि या तो उनका अस्तित्व ही नहीं है या
वे गूँगे-बहरे हैं,
अन्धे, परपीड़क हैं;
क्रूरता की चरम अवस्था को
पार करते हुऐ!
लेकिन अपने जाने के बाद हुऐ पैदा
इस शून्य में,
भटकते हुऐ
प्रिय बेटी सारा कहीं
मिल जाऐं तुमको वे
तो ज़रूर माफ़ उन्हें कर देना।
धरती से उठे बग़ावत के गर्म
धुऐं के दबाव में
अपनी इस बेहुदा हरक़त के लिऐ
ज़ार-ज़ार शर्मसार होते हुऐ
तुम्हें दिखेंगे वो बार-बार!
तुम्हें ही
बनाते हुऐ-
ख़ुदाई खिदमतगार।

 

सारा आबिदी

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