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© Nikhil Sharma

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चेहरे यहाँ सब अनजाने होते हैं |
चलते फिरते यूँ ही खो जाने होते हैं ||
पर ज़िन्दगी के हर पहलु यहाँ दिख जाते हैं |
ख़ुशी और ग़म दोनों यहाँ संग दिख जाते हैं ||

कुछ गरीब अपंग दीखते हैं भीख मांगते हुए |
बेबस और लाचार, अँधेरे कमरों के झरोखों से झांकते हुए|| 
गुज़रते हैं वहां से कुछ अमीर
अपने कन्धों पर घमंड टांगते हुए |
जैसे एक 'हिन्दुस्तान', दूसरे 'हिन्दुस्तान' को लांघते हुए ||

रिश्ते भी निभाने लोग आते हैं यहाँ |
गाडी पर चढाने, या भीड़ जुटाने आते हैं यहाँ ||
एक इंसान 'रेलगाड़ी' के पीछे ऐसे भागता है |
जैसे एक बेरोज़गार नौकरी के लिए जागता है || 
जब वो गाडी छूट जाती है |
ऐसा लगता है, जैसे एक उम्मीद टूट जाती है ||

इस भीड़ में कभी खुशियाँ हंसती हैं |
तो कभी ज़िन्दगी पेहेंती है मौत का यूनीफ़ॉर्म ||
एक युग का, एक ज़िन्दगी का 
एक देश की बेचैनी की कहानी कहता है प्लेटफ़ॉर्म ||

zindagi kahaani bechani khushiyaa

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