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Devkaran Gandas

Others

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Devkaran Gandas

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दौर गुज़र गया है

दौर गुज़र गया है

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ऑफ़िस की उस 

लोहे की जर्जर सी रंगहीन 

आलमारी की ताकों से

जब मैंने झांका उस 

कुर्सी की ओर 

जिस पर तुम 

बैठा करती थी अक्सर 

मुझे ऐसा लगा जैसे इक 

दौर गुज़र गया है ।


अब वहां वो 

बात नहीं रह गई है,

जिस बात को अक्सर

करते थे तुम और मैं

अब वहां सिर्फ रखीं हैं,

कुछ टेबलें और उस पर

धूल फांकती इक

गुमनाम सी किताब

जो रह रह कर

मुझे दिलाती है याद

उस वक़्त की, जिसका

दौर गुज़र गया है ।।


अब वहां उस कुर्सी पर

वो हँसी नहीं 

खिलखिलाती है

उसे घेर लिया है 

इक अनजान सी 

खामोशी ने 

जो चली आयी थी 

तेरे जाने के बाद

मुझे यह बताने कि वो

दौर गुज़र गया है।


फिर भी मैं ताकता

रहता हूं उस कुर्सी

की ओर , यही आस

लिए कि फिर से 

आयेगी वो हँसी

वो नादान सी मुस्कुराहट

जो खिला करती थी 

सब के जाने के बाद 

सिर्फ मेरे साथ,

और इक बार फिर से

आएगा वो दौर, जो 

दौर गुज़र गया है ।


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