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टूटकर-बिखरकर
टूटकर-बिखरकर
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© Rahul Rajesh

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मुझे टूटने दो

बिखरने दो

यूँ ही

इसी तरह

 

टूटना-बिखरना भी

एक ज़रूरी क्रिया है

जीवन की, सृजन की

 

जैसे डाल से टूटी पत्ती पीलियाई

बिखरती है गलकर मिट्टी में

मिट्टी को और उर्वर बनाती हुई

 

जैसे आकाश से टूटकर गिरता तारा

धरती पर बिखरते हुए दे जाता है

आँखों को यकीन

कि पूरे होंगे सपने

 

जैसे टूटकर-बिखरकर

काले-धूसर पत्थर

बदलते हैं

चिकने-चमकीले रेत-कणों में

 

मैं भी टूटकर-बिखरकर

गलूँगा-ढलूँगा

एक नई शक्ल में

 

लौटूँगा

एक नई आँच लेकर

 

लौटूँगा

एक नई आब लेकर

 

अभी मुझे टूटने दो

बिखरने दो

 

यूँ ही

इसी तरह...

#poetry #hindipoetry

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