सपने
सपने
सुबह हुई सूरज निकल रहा, बिस्तर से उठा मैं सोच रहा रात तो बीत गई जल्दी-जल्दी दिन चढ़ गया आज फिर मेरे यार, आलस से मैं घिरा पड़ा ना करें कुछ करने को मन मेरा, पर डांट सुन मम्मी कि मैं जल्दी-जल्दी हुआ तैयार। खुला अखबार चाय के साथ चुसकी चाय की भर-भर कर मेरे मन में आया एक विचार खबर है पढ़ी डॉक्टर की तो बनेंगे हम डॉक्टर यार। चाय पी कर भागे खेलने बल्ले से की छह और चार की बरसात, सब ने कहा तू तो है छोटा खिलाड़ी दमदार। थक कर बैठा पेट में दौड़े चूहे खूब बारंबार, खाना खाया चाचा के संग चाचा ने दिए अपने विचार, बोले जज के तो हैं बड़े ऐशों आराम सवाल एक उमड़ा मन में फिर एक बार क्यों ना बनकर देखा जाए जज मेरे यार। पेट भरा मैं भागा ऊपर खोला टीवी शुरू किया नाटकों का संसार देख नाटक में उत्सुक हुआ बोला जाकर सब के पास हम मैं है छुपा हुआ एक कलाकार। हंसते मुस्कुराते सब बोले तुम्हारे तो हैं ढेर सारे अरमान धीरज रख बड़ा होकर तू पा लेगा इन सब का जवाब। शाम हुई सूरज का संपन्न हुआ आज का काम चंदा मामा का हुआ उजाला चमकदार। सोफे पे में बैठा सोचता रहा कि बनूँ मैं क्या बड़े होकर यार हे भगवान तू ही करना मेरा कल्याण। आंखें हुई बंद सोने का समय आखिरकार आया यार पर नींद ने ना किया मुझ पर अपना काम घिरा हुआ सपनों से मेरा दिमाग समझ आया एक मूल विचार देखे जो हम नींद में वह ना है सपनों का काम सोने ना दे जो हमें वही तो है सपनों का असली चमत्कार ।।
