Sneh Goswami

Children Stories Drama Inspirational


5.0  

Sneh Goswami

Children Stories Drama Inspirational


सपने

सपने

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छोटे से बच्चे को झीनी-सी शर्ट पहने सब्जियों पर पानी छिड़कते देखा तो कोट और गुलुबन्द पहने होने के बावजूद मैं बुरी तरह से काँप उठी थीI जनवरी की हड्डियों में सीधी घुसने वाली ठंड पड़ रही थीI धुंध और कोहरा अपनी चादर ताने बैठा था, सूरज का ताप भी मानो ठंड से डर के कहीं जा छिपा थाI सड़कों पर कोई-कोई ही नज़र आ रहा था I

उफ़! इतनी भयंकर सरदी और यह बच्चा यहाँ मजदूरी कर रहा हैI

"क्या नाम है तुम्हारा?"

"राजू , नहीं राजकुमारI"

मैं उसका आत्मविश्वास देख कर हँस पड़ी थीI

"पढ़ना चाहते हो?"

वह असमंजस में पड़ गया था कि हाँ कहे या नI

"तुम कितने साल के हो?"

"जी सात सालI"

उसका पिता अचानक बात में कूद पड़ा था - "जी ये तो घर में खेलता रहता हैI आज ही जिद करके साथ आ गया है जी... ये तो पानी से खेल रहा था जी पानी से जी, मैं तो रोक रहा था जी इसे...वह एक ही साँस में सफाइयाँ दिए चला जा रहा थाI"

"अरे अरे रुको भाई! मैं कोई पुलिस हूँ क्या? मैं तो सोच रही थी इसे स्कूल में भर्ती करवा देंI"

मैंने उसे एक मध्यम दर्जे के स्कूल में दाखिल करवा दिया बेशक इसके लिए उसके घर वालों से पूरा एक महीना युद्ध स्तर पर बहस करनी पड़ी थीI स्कूल के प्रिंसिपल ने आर टी इ के अंतर्गत उसकी पूरी की पूरी फ़ीस तो माफ़ की ही ,साथ ही वर्दी और किताबें भी दिलवा दी थी तो मैंने सुख की साँस ली थीI अब वह रोज़ सज धज कर स्कूल जाने लगा था ..हर रोज़ सुबह स्कूल और अक्सर शाम को अपनी सब्जी की दुकान परI

शुरु-शुरु में वह बेहद डरा-सा सहमा-सा रहता था फिर धीरे-धीरे खुलने लगाI प्रिंसिपल ने सुबह की सभा में स्टेज पर बुला कर उसकी पीठ ठोकी थीI बच्चों को उससे प्रेरणा लेने, मेहनत करने की सलाह दी थी और एक दिन अचानक स्कूल से फोन आया थाI वह गंदी-गंदी ताश की गड्डियाँ बेचते हुए पकड़ा गया था अपने ही स्कूल के चौथी कक्षा के बच्चों कोI  

"ये सब क्या है राजू?" वह सर झुकाए खड़ा था, उसकी टीचर्स ने बताया कि इससे पहले भी वह दो बार पकड़ा जा चुका था ...कि वह पिछले एक महीने से यही सब करता थाI बाकी बच्चों की तरह स्कूल की केन्टीन से टाफ़ियाँ, पर्क, चिप्स और बर्गर खाने के लिएI मैंने उसे थोड़ा डाँट से, थोड़ा प्यार से समझाया था, आगे से ऐसा मत करना और उसने एक शरीफ बच्चे की तरह सिर हिला कर हामी भर दी थी और पन्द्रह दिन बाद ही वह फिर दुकान पर बैठने लगा थाI इस बार उसने अपने बाल नए स्टाइल से सेट कराने के लिए अपनी किताबें और कापियाँ बाज़ार में बेच दी थी और उन्हें दोबारा खरीदने के लिए स्कूल के बाहर बैन की गई सी डीस बेच रहा था कि पुलिस ने पकड़ लिया थाI वार्निंग देकर, पिता की गारंटी पर छोड़ तो दिया गया पर स्कूल से निकाल दिया गया थाI   

मुझे देख कर उसने सब्जियों के ढेर के पीछे छिपने की कोशिश की थीI मदन ने हाथ जोड़ दिए थे - "मैडम जी, १ आपने तो बड़ी कोशिश की जी पढ़ाने की जी पर बिना भाग के कभी कुछ मिलता नहीं न जीI यहाँ ठीक है जी निगाह के सामने रहेगा जी, काम भी सीख जाएगाI कल को करना तो यहीI" मैं उन्हें शिक्षा के महत्व पर लम्बा चौड़ा लेक्चर पिलाने की सोच रही थी पर मदन का इतना सारा लेक्चर सुन कर मैंने अपना इरादा बदल दिया और चुपचाप वहाँ से लौट आयी, यह सोचते हुए कि कमी रही तो रही कहाँ?


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