रिश्तों का सम्मान
रिश्तों का सम्मान
आज फिर माँ का फोन आया। हाल चाल पूछने के बाद पूछा,"घर कब आ रही हो ?" मैने घबरा कर पूछा, "सब ठीक है न" बोलीं , "ठीक है, बस कुछ काम था ...जब आओगी तब कर लेंगे।" यह कह कर फोन रख दिया।
अच्छा लगता था कि माँ अब भी मुझे याद करती हैं, पर यह बात खाये जा रही थी कि क्या हो सकता है जो उन्हे फोन करना पड़ा। घर में बेटी से बढ़कर बहु उनके पास है, फिर क्या काम हो सकता है ? भाभी ने जिस तरह घर संभाल लिया था उससे तो नहीं लगता कि किसी काम को करने में माँ को अब मेरी जरूरत होगी । माना भाभी मुझसे उम्र में छोटी हैं, पर रिश्ते में बड़ी थीं। सोचते सोचते कब आँख लग गई पता ही नहीं चला।
सुबह उठी तो भी बात दिमाग में चल रही थी। नाश्ता निबटा भाभी को फोन किया। वो शायद पहले से ही जानती थी। रसीवर उठाते ही तुरन्त बोली ,"दीदी मम्मी ने फोन किया था आपको ?" मैने कहा -हाँ। ज़ोर से हँस पड़ी, अरे दीदी खादी की सेल चल रही थी रजाई लेने जाना था। मम्मी से कहा तो कहने लगी अभी रूक जाओ, नीरू आयेगी तो ले लेंगें। आप सण्डे से पहले आ नहीं पायेंगी और सेल दो दिन और है। सारी बात समझ आ गई। भाभी से रजाई की कीमत पूछ, दो चार बातें इधर उधर की कर मैंने फोन रख दिया।
बात छोटी सी थी पर कहीं मुझे कचोट रही थी। भाभी के होते हुए एक रजाई खरीदने के लिए मेरी सलाह की जरूरत ! मुझे लगता था कि शादी के बाद बेटी को मायके में दखल नहीं देना चाहिए। अलबता भाभी की सलाह को सर्वोपरि रखना चाहिए। अब समय आ गया था स्वयं को बीच से हटाने का।
मम्मी को फोन पर अपने ना आ पाने का बहाना बना दिया। रही बात खरीददारी की सो यह कह कर समझा दिया कि आपके यहाँ चीज़ सस्ती होती है क्योंकि टैक्स कम होता है छोटे सिटी का । माँ को बात जँच गई।
शाम को भाभी के फोन से पता चला कि माँ ने उसे यह कह कर रजाई लाने को कहा कि कहीं सेल न खत्म हो जाए। मैं बहुत खुश थी कि काम भी हो गया ,सबका सम्मान भी बना रहा और ठेस भी न लगी। आज माँ -पापा नहीं हैं पर यह उन्ही के प्रताप का फल है कि हम तीनों भाई बहन जुड़े हैं। भैया भाभी ने हर वार त्योहार पर हमें मान दे हमारा सम्मान बढ़ाया है, हमें भी ननदों से ज्यादा बहन का सम्मान दिया है। सच तो यह है कि भाभी में माँ और भाभी के बनाए खाने में माँ की खुश्बू आती है।
इतने सालों के अनुभव से यह बात तो दावे से कह सकती हूँ कि हमें वह व्यवहार दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए जो स्वयं के लिए पसंद न हो। कुछ पाने के लिए देना भी पड़ता है। रिश्तों की नींव तो वैसे भी प्यार व सम्मान पर टिकी होती है। ताली एक हाथ से नहीं बजती । बेटी और बहु जब एक ही तराजू में तुलेंगें तभी रिश्ते सुदृढ़ हो पाएँगे।
