मस्त जीवन
मस्त जीवन
60 -70 के दशक का हमारा विद्यार्थी जीवन बहुत मस्त था। उस समय पढ़ाई के बारे में तो हमारा यह ख्याल था कि अगर स्कूल में गए हैं तो पढ़ाई तो होगी ही मसलन जैसे कि फूल सुगंध देता है तो विद्यालय में पढ़ाई करेंगे। पढ़ाई के लिए कोई खास मारामारी नहीं होती थी। पढ़ लिए पास हो गए बहुत अच्छा। अगर पास नहीं भी हुए तो भी घर में कोई तो भाई-बहन पास हुआ होगा इसलिए हलवा तो बनेगा ही। उस समय अड़ोस पड़ोस से लोग हमारे नंबर पूछने नहीं आते थे बस फेल होने वाले को केवल इतनी सांत्वना दिया करते थे कोई बात नहीं इम्तिहान है कोई कुंभ का मेला थोड़े ही है जो कि 12 साल में आएगा अरे अगले साल फिर दे देना बस शाम तक सब नॉर्मल हो जाता था।
पाठकगण लेकिन उस समय ज्यादा मान सम्मान उनको मिलता था जो कि सांस्कृतिक कार्यों में भाग लेकर इनाम लाता था। मसलन हमारा सरकारी स्कूल था और 26 जनवरी की परेड में हम सब शामिल होकर जाना चाहते थे। दिल्ली में तालकटोरा गार्डन में बहुत से कार्यक्रम हुआ करते थे। 26 जनवरी की परेड में सिलेक्शन होने के लिए सितंबर अक्टूबर से ही हम लोग अभ्यास आरंभ कर देते थे और नवंबर या दिसंबर में तालकटोरा गार्डन में एक प्रोग्राम के अंतर्गत यह निश्चित हो जाता था कि हमारे स्कूल का सिलेक्शन हुआ या नहीं। दिल्ली के लगभग बहुत से सरकारी स्कूल गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में भाग लेने के इच्छुक होते थे।
उस साल भील डांस होना था। मेरी भी सिलेक्शन हो गई उस समय मेरी क्लास में से कुल छह या सात लड़कियां छोड़कर लगभग सभी सिलेक्ट हो गई थी। हम लोग अधिकतर टाइम बाहर प्रैक्टिस किया करते थे। दो दो लड़कियों का जोड़ा बना हुआ था और इस तरह से वह हमें डांस सिखाते थे। जिनके स्टेप्स सही नहीं लगते थे उन्हें वह क्लास में पढ़ने के लिए भेज देते थे।
जो क्लास में पढ़ने के लिए चले जाते थे वह अच्छा अनुभव नहीं माना जाता था क्योंकि बाकि सब तो बाहर मजे कर रहे हैं और वह वचारे डांस में सेलेक्ट नहीं हुए माने जाते थे।
मेरा कद तब बहुत छोटा था और मेरे साथ में जो लड़की चुनी गई वह बहुत लंबी थी इसलिए एक दिन बाहर से आए डांस टीचर ने मेरी जगह में एक लंबी लड़की को सेलेक्ट करके मुझे भी वापस क्लास में पढ़ने के लिए भेज दिया। पाठकगण मुझे बहुत दुख हुआ।
हमारा डांस कई चरणों में अनुमोदित होता था हर चरण में बच्चे कम होते जाते थे। मतलब कि बाहर डांस वाले बच्चों की संख्या कम हो जाती थी और क्लास में पढ़ने वालों की ज्यादा।
अब मेरी सहेलियों का बाहर डांस करना और मेरे को क्लास में बैठना बहुत दुखदाई लगता था। उस समय मुझे कितना दुख हुआ होगा आप इस बात का अंदाजा केवल इस बाद से ही लगा सकते हैं कि मुझे अभी तक यह घटना याद आती है तो दुख हो जाता है।
सितंबर से प्रारंभ हुई है प्रक्रिया अक्टूबर अंत में मुझे क्लास में बिठा दिया गया लेकिन नवंबर में एक दिन शायद किसी लड़की का डांस अच्छा नहीं होगा तो मैडम को याद आया कि मधु कद की छोटी है और वह इस लड़की के साथ बिल्कुल मैच करेगी तो उन्होंने मुझे फिर से डांस के लिए बुला लिया
बहुत खुशी हुई और मुझे आज तक भी याद है हाथ हिला हिला कर के भीम सलम पंपागी बोलना बहुत अच्छा लगता था। कोशिश करूं तो बहुत सारे स्टेप्स भी याद आ जाएंगे।
सेलेक्ट होने के बाद में हम बहुत जगह अपना प्रोग्राम देने के लिए जाते थे। अंत में 26 जनवरी वाले दिन जब हमारा प्रोग्राम होना था तो हमको सुबह 5:00 तक स्कूल में पहुंचना होता था। इतनी ठंड के समय केवल पत्ते लगाई हुई स्कर्ट और टॉप पहनकर के जाने के लिए हमारी मम्मी ने मना कर दिया कि तुम्हें ठंड लग जाएगी।
बड़ी मुश्किलों से उन्हें मनाया। सरकारी कॉलोनी में रहते थे और हमारी कॉलोनी की और भी दो तीन लड़कियां सेलेक्ट हुई थी उनके साथ बड़ी मुश्किल से मम्मी ने सिर्फ इस शर्त पर भेजा कि नीचे गरम पजामी और गरम स्वेटर पहनकर रखेगी।
घर से तो मम्मी के कहे अनुसार चली गई लेकिन स्कूल में जाकर के हमने वही पत्तों वाली स्कर्ट पहनी और टॉप। यकीन मानिए इंडिया गेट तक प्रोग्राम करते हुए हमें ठंड का नाम भी नहीं लगा। उत्सुकता और खुशी इतनी अधिक थी कि आज भी 26 जनवरी की परेड में भाग लेना भूलता नहीं है।
तभी तो मैं विश्वास के साथ कहती हूं कि हमारे जैसा विद्यार्थी जीवन आज के बच्चों की किस्मत में शायद ही हो। हम लोगों के लिए पास होने से भी ज्यादा वरीयता और सम्मान ऐसे प्रोग्रामों में हिस्सा लेने से मिलता था। गर्व से कभी स्कूल से एनसीसी की यूनिफॉर्म पहन कर घर में आते थे और कॉलोनी में सबको दिखाते थे।
वास्तव में हमारा विद्यार्थी जीवन बहुत यादगार था। इतना मस्त जीवन ना तो मेरे बच्चों का रहा और ना ही उनके बच्चों का। नानी दादी बनकर जब उनको मैं अपने विद्यार्थी जीवन की कहानियां सुनाती हूं तो उनके लिए यह सब बातें बहुत हैरानी की होती हैं।
