जिंदगी तेरे बिन
जिंदगी तेरे बिन
"बीबीजी चाय पी लई कहा?" अचानक से मानसी की तंद्रा टूटी। क्या वह आज पूरी रात यूं ही बैठी रही थी ? कुर्सी से सर उठाया अपने फैले हुए बालों को समेटते हुए शांता को चाय बनाने के लिए कहा। प्रशांत और राखी कनाडा की फ्लाइट पकड़ने के लिए रात को 2:00 बजे घर से निकल चुके थे तब से मानसी धम्म से जो कुर्सी पर बैठी, अभी उठी थी। उनके जाने के बाद जो अकेलापन पसरा और उस अकेलेपन में जो पुराने ख्यालों की भीड़ उमड़ी वह रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। अब आगे का समय कैसे बीतेगा हालांकि प्रशांत ने तो कहा था कि हम कुछ समय बाद आपको भी कनाडा बुलाएंगे और हो सका तो हम खुद ही आपको लेने के लिए आएंगे, आंसुओं के आवेग में कुछ ठीक से सुनाई भी तो नहीं दे रहा था। इतने में ही शांता बाई चाय लेकर आ गई।
पूरा घर फैला हुआ था। मानसी उठी, उसने जो बहुत से लड्डू बनाए थे, बच्चों ने यूं ही छोड़ दिए थी कि फ्लाइट में एक तो भार ज्यादा हो जाएगा और दूसरा ले जाना मुश्किल भी हो जाएगा। ऐसा ही उसने हाथ के बनाए अचारों के साथ भी किया था। मानसी जी ने बच्चों के फैले कपड़ों को उठाया। शांताबाई को सब कपड़ों को समेटकर एक गठरी में बांधने के लिए कहा। थोड़ी देर को घर से बाहर बरामदे के लान में आकर वह चाय पीने बैठ गई। मन बेहद अनमाना हो रहा था। अपने मन को कठोर करते हुए मानसी ने मन को समझाया ऐसा पहली बार तो नहीं हो रहा है। हर बार भी तो तुम किसी के भी बिन जी तो गई। जिस परमात्मा ने हर बार ख्याल रखा है वही अब भी ख्याल रख लेगा।
अचानक से मानसी अपने बचपन में पहुंच गई जबकि वह अपनी सखी शिखा कि बिन जीने की सोच भी नहीं सकती थी। इन दोनों की जोड़ी पूरे गांव में मशहूर थी। जहां मानसी होगी वही शिखा। दोनों के घर भी साथ-साथ थे और स्कूल भी दोनों साथ ही जातीं थी। आठवीं से जब नौवीं क्लास के लिए बड़े स्कूल में दाखिले की कोशिश में थे तभी शिखा के पिता ने शहर जाने का फैसला किया। शिखा का जाना बालमन पर बहुत बड़ा आघात था। उसके बाद नए स्कूल में नई लड़कियां, जानकार तो बहुत बड़ी ,लेकिन शिखा जैसी सहेली फिर कोई ना मिली। कई बार तो उसकी याद में पढ़ाई में भी मन नहीं लगता लेकिन जैसे तैसे स्कूल की पढ़ाई खत्म करी और प्राइवेट से बी.ए करने लगे। बस इस बीच सारा समय घर का काम करने और मां से बातें करने में ही जाता था। अभी सेकंड ईयर की पढ़ाई ही कर रहे थे कि शैलेश जी के साथ विवाह पक्का हो गया।
मां को छोड़कर जाने और उनके बिना जीने की कल्पना से ही मन सिहर जाता था लेकिन मां के बिना भी जीवन चला और जीवन ही क्या एक दिन तो मां भी चली गई इस दुनिया को छोड़ कर। माना मानसी ससुराल में पूरी तरह रम गई थी। उसके परिवार में उसके पति के अलावा एक सास और एक जेठ जेठानी थे जो कि दूसरे शहर में रहते थे। कहने को तो घर में केवल पति और माताजी ही थे लेकिन ससुराल में घर और दो भैंसों को संभालने में ही पूरा दिन कहां चला जाता था कह नहीं सकते। मां कई बार याद बनकर आती थी लेकिन हाय री परंपराएं, वह कभी अपनी बेटी के घर उससे मिलने नहीं आई और मानसी को मायके ज्यादा जाने नहीं दिया गया या यूं कहो गृहस्थी के कामों से फुर्सत ही नहीं मिली। ऐसे ही मां के मरणोपरांत जब एक बार जाना हुआ तो अपनी गृहस्थी के कामों के कारण मां के लिए तेरह दिन भी मायके में ना रह पाई। वह अपने ख्यालों में यही सोच रही थी कि मैं अपनी मां के बिन भी तो जीना सीख गई थी। ससुराल में कितने अच्छे से रम गई थी। ससुराल में अपने बेटे प्रशांत को पाकर तो उसे कोई कमी ही नहीं रह गई थी। बच्चे के रूप में उसे जो खिलौना मिला उस खिलौने ने सब कुछ भुला दिया। उसे ही नहीं उसकी सासू मां भी हर समय प्रशांत को तैयार करती और उसके साथ खेलती थी। प्रशांत का पैदा होना उनके लिए भाग्योदय ही लेकर आया था क्योंकि उसके बाद शैलेश जी की भी चंडीगढ़ के स्कूल में मास्टर की सरकारी नौकरी लग गई थी।
अब गांव से सब कुछ समेटकर चंडीगढ़ जाना भी आसान नहीं था, यहां दिल्ली में तो गांव में रहने के लिए अपना घर ढोर डंगर सब थे, लेकिन मां को और घर को भी छोड़ कर चंडीगढ़ जाना कैसे हो सकता था और अब तो प्रशांत को भी स्कूल में दाखिल करवाना था। चंडीगढ़ जैसा महंगा शहर जहां हर चीज मोल की हो ,रहना मुश्किल हो जाना था। इसलिए यही फैसला किया गया कि शैलेश जी अकेले ही वहां पर रह लें। छुट्टियों में घर आ जाया करें। जब कभी कुछ पैसे इकट्ठे हो जाएंगे तो चंडीगढ़ में भी कुछ देख लेंगे। शैलेश जी के बिना रहना भी मुश्किल तो हुआ था लेकिन प्रशांत तो था ना। समय यूं ही बीत रहा था कि अम्मा जी को एक बार साधारण बुखार आया जो कि डेंगू में परिवर्तित हो गया और अम्मा जी की जीवन लीला समाप्त कर गया। प्रशांत को संभालना भी अब दिनों दिन मुश्किल होता जा रहा था। ढोर डंगर भी ऐसे थे कि माताजी के बिना संभल ही नहीं पा रहे थे। हालांकि प्रशांत सातवीं क्लास में ही था लेकिन फिर भी अब उसकी पढ़ाई भी दिनोंदिन मुश्किल होती जा रही थी। अब के जब शैलेश जी ने देखा तो उन्होंने ढोर डंगर और घर को बेचकर चंडीगढ़ में ही प्लॉट ले लिया था। उसमें केवल दो कमरे और रसोई बनी हुई थी। बाकि जगह में मानसी ने सब्जी वगैरह उगा दी थी। जिंदगी फिर भी अनवरत गति से चल रही थी। अब मानसी के पास समय बहुत था तो उसने आसपास के लोगों से भी दोस्ती कर ली थी। चंडीगढ़ शहर की आबोहवा भी उसे बहुत रास आई थी। मां के बाद मायका छोटा तो सासु के बाद ससुराल दोनों ही छूट चुके थे। धीरे धीरे चंडीगढ़ वाला घर ही शैलेश जी ने दो मंजिला बनवा लिया था। ऊपर वाली मंजिल किराए पर दी गई। शैलेश जी भी टीचर से प्रिंसिपल के पद पर आ चुके थे। अब उनकी गिनती भी काफी प्रतिष्ठित लोगों में होने लगी थी। प्रशांत ने भी अब इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला ले लिया था। इंजीनियरिंग करने के बाद उसकी केंपस सिलेक्शन हैदराबाद में हो गई थी। प्रशांत के बिना घर मानो खाने को दौड़ता था। शैलेश जी का तो फिर भी काफी समय स्कूल में कट जाता था लेकिन मानसी यूं ही पुराने समय को याद करती हुई बैठी रहती थी या कभी पार्क में एक दो सहेलियों के साथ थोड़ा समय बिता देती थी। चंडीगढ़ में आते ही उसने शांताबाई को काम करने के लिए रख लिया था जब शैलेश जी अकेले रहते थे तब भी शांताबाई ही उनका खाना बना दिया करती थी तब से अब तक शांताबाई ही घर का सारा काम करने लगी थी। जीवन के उस मोड़ से इस मोड़ तक आते-आते शरीर भी अब काफी थकने लगा था। वह अपना अधिकतर समय घर को सजाने संवारने में ही लगी रहती थी शैलेश जी के रिटायरमेंट के बाद दूर दूर तक घूमने जाने के उसने बहुत सपने देखे थे।
उस दिन जब स्कूल से फोन आया कि शैलेश जी को अचानक से हार्ट अटैक आ गया और वह अस्पताल में है। बदहवास सी जब अस्पताल की ओर भागी तो शैलेश जी भी उसे छोड़ कर जा चुके थे। दुनिया फिर भी चल रही थी। हालांकि आज तक उसने बहुत से लोगों को खोया और हार्ट अटैक होते भी बहुत से लोगों को देखा लेकिन उसके खुद के साथ ऐसा होगा ऐसा तो कभी जीवन में सोचा भी ना था। प्रशांत हैदराबाद से आ गया था और फिर 13 दिन तक होने वाली रस्में जिनमें कि वह उपस्थित तो थी लेकिन मानसिक रूप से वह कहां थी उसे खुद नहीं पता पर फिर भी वह जी गई थी अब तो हैरान सिर्फ इसलिए ही हो रही थी कि वह शैलेश जी के बिना जी कैसे गई।
प्रशांत ने भी अब अपनी ट्रांसफर चंडीगढ़ में ही करवा ली थी और राखी के साथ विवाह भी कर लिया था। समय यूं ही बीत रहा था। अब जीवन भी बदल चुका था और परिवार भी, संस्कार भी और जीवन के मूल्य भी। परिवार का मुखिया अब तो प्रशांत ही बन चुका था, घर को सजाने संवारने के वह तौर तरीके जो कि उसके सदा से रहे थे वह प्रशांत और राखी को पसंद नहीं थे। हालांकि दोनों ने एक दूसरे को कुछ कहा नहीं था लेकिन फिर भी मानसी का अंदर से बहुत कुछ टूटता ही जा रहा था। अकेलापन दिनों दिन बढ़ रहा था। ना मायका था ना ससुराल। कहने को वह घर जिसे सजाने संवारने में उसने अपनी जिंदगी लगाई थी उस घर के तौर तरीके बदल चुके थे। उस घर में भी सोने उठने, खाने-पीने सब तरह की दिनचर्या में बदलाव आ चुका था। जीवन कई बार शैलेश के बिना भार सा लगता था लेकिन फिर भी जी गई थी ना? आस पड़ोस की घर की उसकी कुछ सहेलियां जो कि हम उम्र थी ऐसे ही कह सुनकर समय बीत रहा था।
घर के मुखिया और अपने बेटे प्रशांत को कुछ भी कह कर वह नाराज नहीं करना चाहती थी क्योंकि उसे पता था कि आज प्रशांत और राखी को नहीं अपितु उसे उनकी जरूरत है और यह बात भी उसे अच्छे से समझ आ चुकी थी कि खुद को ही बदलना जरूरी है अन्यथा इस उम्र में उनके बिना जीना तो बहुत मुश्किल हो जाएगा।
लेकिन यह क्या? प्रशांत ने मानसी को बताया कि मुझे कनाडा में अच्छी नौकरी का ऑफर है यह मेरे भविष्य का सवाल है इसलिए मेरा जाना अनिवार्य होगा। राखी को भी कनाडा में कोई ना कोई काम मिल जाएगा हम दोनों सेटल होते ही आपको बुला लेंगे। मानसी जिस चीज से डर कर आज तक सब कुछ देखते हुए भी अनदेखा कर रही थी वही परिस्थिति उसके सामने थी। वैसे भी उन्होंने मानसी से इजाजत नहीं मांगी थी अपितु सूचना दी थी। हालांकि मानसी का अंतर्मन चीख चीख कर कह रहा था मुझे अकेले छोड़कर तुम लोग कैसे जा सकते हो इतने अनजान और इतने पराए कैसे हो सकते हो? लेकिन --------- इस बार भी वह मूकदर्शक सी होकर सिर्फ उन्हें जाते हुए ही देखती रही। पूरी रात किस उहापोह में बीती, किन ख्यालों में बीती लेकिन रात कैसी भी बीती हो उसने अपने मन को तैयार कर लिया था कि यह परिस्थिति भी उसके लिए परमात्मा का क्रोध नहीं अपितु वरदान ही होगी। जिस तरह से आज तक वह सब के बिना जी रही वह आगे भी जी जाएगी।
तभी शांताबाई ने आकर पूछा बीवी जी सारा काम हो गया है आपके लिए खाना भी बना कर रख दिया है, अब मैं जाऊं क्या? हां शांताबाई तुम जाओ और शाम को थोड़ा काम करवाने को आ जाना। यह जो बाहर वाला कमरा है तुम अपने पति के साथ आकर कुछ दिन यहां रह जाना। पौधों को पानी वगैरह दे देना और घर को साफ कर देना ? क्यों बीवी जी आप कहीं कू जा रही है क्या? हां बाकि प्रोग्राम का शाम को बताऊंगी। ऐसा कहकर मानसी में सुनीता भाभी को फोन मिलाया वह रेलवे विभाग से रिटायर्ड थीं और अक्सर वह दूर दूर के टूर अरेंज किया करती थी। उनके पति वर्मा जी का टूर से ही संबंधित एक ऑफिस भी था। मानसी ने सुनीता भाभी से पूछा आप ही कह रही थी ना कि एक ट्रेन चली है जोकि रामेश्वरम धाम की और, और भी बहुत जगह की सैर करवाती है क्या मुझे उसकी टिकट मिल सकती है? अरे हां आपके लिए तो कुछ भी करके मैं अरेंज कर ही दूंगी किसको जाना है? मुझे? क्या? हां सुनीता जी अब इच्छा हो रही है कि जब खुद के साथ ही रहना है तो बहुत सी ईच्छाएं जिनके लिए मन मारा है क्यों ना पूरी कर ली जाएं। बहुत पढ़ लिया इन मोह बंधनों में। अगर टिकट हो तो मेरी बुक करवा देना पैसे में भिजवा दूंगी, हां हां क्यों नहीं ,मैं आपके मोबाइल पर पूरा प्रोग्राम भेज देती हूं और इस बार तो मैं भी जा रही हूं और आपके पीछे वाले घर से मिसिज भसीन भी अपनी मंदिर वाली टोली के साथ जा रही हैं मैं उनको कह दूंगी कि वह अपनी कैब में सुबह आपको भी ले लेंगी। हम वहीं मिलते हैं आप समय पर तैयार रहना पैसे मैं आपसे ट्रेन में ही ले लूंगी। धन्यवाद कहकर मानसी ने फोन रख दिया।
तेरे बिन भी जिंदगी अब भी चलेगी। फोन बज रहा था। प्रशांत लगातार फोन किए जा रहा था लेकिन 25 दिन का टूर है। सारे कपड़े सामान लगाना है। इतनी फुर्सत कहां? मां तुम कैसी हो? फोन उठाते ही प्रशांत ने बोला, बेटा तुम अपना ख्याल करो मैं ठीक हूं अच्छा बाद में बात करते हैं। मानसी जी फिर व्यस्त हो गई थी। जिंदगी अब भी अनवरत चल रही थी।
