Charumati Ramdas

Children Stories Children


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जब डैडी छोटे थे - 1

जब डैडी छोटे थे - 1

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जब डैडी बहुत छोटे थे और छोटे से शहर पाव्लोवो-पसाद में रहते थे, तो किसी ने उन्हें एक बेहद ख़ूबसूरत, बड़ी गेंद दी. ये गेंद सूरज जैसी थी. नहीं, वो सूरज से भी ज़्यादा अच्छी थी. पहली बात तो ये कि उसकी तरफ़ बिना आँखें सिकोड़े देख सकते थे. वो सूरज से ठीक चार गुना ज़्यादा ख़ूबसूरत थी, क्योंकि वो चार रंगों वाली थी. सूरज तो सिर्फ एक ही रंग का होता है, और फिर उसकी ओर देखना भी मुश्किल होता है. गेंद की एक बाज़ू गुलाबी थी, बिल्कुल कैण्डी जैसी, दूसरी बाज़ू – ब्राऊन, जैसी सबसे स्वादिष्ट चॉकलेट होती है. ऊपरी हिस्सा था नीला, आसमान जैसा, और नीचे का हिस्सा था हरा, घास जैसा. उस छोटे से शहर पाव्लोवो-पसाद में ऐसी गेंद किसी ने अब तक नहीं देखी थी. उसके लिए ख़ास तौर से मॉस्को गए थे. मगर, मेरा ख़याल है कि मॉस्को में भी ऐसी गेंदें ज़्यादा नहीं थीं. उसे देखने के लिए न सिर्फ बच्चे, बल्कि बड़े भी आते थे.

"ये है गेंद!" सब कहते.

हाँ, ये वाक़ई में बेहद ख़ूबसूरत गेंद थी. डैडी बहुत घमण्ड दिखाते थे. वो ऐसा दिखाते जैसे कि गेंद का आइडिया उनका था, उन्होंने ही इसे बनाया और चार रंगों में उसे रंगा है. जब डैडी अपनी गेंद से खेलने के लिए अकड़ते हुए सड़क पर निकलते तो लड़के चारों ओर से भाग-भागकर उनके पास आ जाते.

 "ओय, क्या गेंद है!" एक लड़का कहता. "चल, खेलेंगे!"

मगर डैडी अपनी गेंद कसके पकड़ लेते और कहते:

 "नहीं दूँगा! ये मेरी गेंद है! ऐसी तो किसी के भी पास नहीं है! पता है, इसे मॉस्को से लाए हैं! दूर हटो! मेरी गेंद को छूना नहीं!"

लड़के कहते:

 "ऐ तू, लालची कहीं का!"

मगर डैडी फिर भी उन्हें अपनी आश्चर्यजनक गेंद न देते. वो अकेले ही उससे खेलते. मगर अकेले खेलना तो बड़ा बोरिंग होता है. और, लालची डैडी जानबूझकर लड़कों के पास जाकर अपनी गेंद से खेलते, जिससे उन्हें जलन हो.

तब लड़कों ने कहा:

 "ये लालची है. इससे बात नहीं करेंगे!"

दो दिन तक उन्होंने डैडी से बात नहीं की. और तीसरे दिन बोले:

 "गेंद तो तेरी ठीकठाक है. ये सही है. वो बड़ी है और रंग भी अच्छे ही हैं. मगर, यदि उसे कार के नीचे फेंका जाए तो वो वैसे ही फूट जाएगी, जैसे कोई काली, बदसूरत गेंद फूटती है. इसलिए, ज़्यादा शान दिखाने की ज़रूरत नहीं है.

 "मेरी गेंद कभ्भी नहीं फूटेगी!" डैडी ने अकड़ते हुए कहा, जो तब तक ये समझने लगे थे जैसे उन्हें ही चार रंगों में रंगा गया है.

"बिल्कुल फूटेगी!" लड़के हँसने लगे.

 "नहीं, नहीं फूटेगी!"

 "देख, ये कार आ रही है," लड़कों ने कहा. "तो, देखता क्या है? फेंक! क्या डर गया?"

और छोटे डैडी ने अपनी गेंद कार के नीचे फेंक दी. एक मिनट के लिए जैसे सब जम गए. गेंद अगले दोनों पहियों के बीच से लुढ़कती हुई पिछले बाएँ पहिए के नीचे आ गई. कार कुछ टेढ़ी हो गई, गेंद को धकेलते हुए आगे निकल गई. मगर गेंद वहीं पड़ी रही, एकदम साबुत.

 "नहीं फूटी! नहीं फूटी!" डैडी चिल्लाए और अपनी गेंद की ओर भागे. मगर तभी ऐसा शोर हुआ जैसे किसीने छोटी-सी तोप चलाई हो. ये गेंद के फटने की आवाज़ थी. जब डैडी उसके पास पहुँचे तो उन्हें सिर्फ धूलभरा एक चीथड़ा ही दिखाई दिया, जो बेहद बदसूरत था. तब डैडी रोने लगे और घर की ओर भागे. लड़के पूरी ताक़त से ठहाके लगाते रहे.

 "फूट गई! फूट गई!" वे चिल्ला रहे थे. "तेरे साथ ऐसा ही होना चाहिए, लालची कहीं का!"

जब डैडी भागते हुए घर पहुँचे और बताया कि उन्होंने ख़ुद ही अपनी ख़ूबसूरत गेंद कार के नीचे फेंकी थी, तो दादी ने उन्हें फ़ौरन एक तमाचा मारा. शाम को दादाजी काम से लौटे और उन्होंने भी एक तमाचा जड़ दिया.

ऐसा करते हुए वह बोले:

 "गेंद के लिए नहीं, बल्कि बेवकूफ़ी के लिए मार रहा हूँ."

सब लोग बड़ी देर तक अचरज करते रहे कि इतनी बढ़िया गेंद को कोई कार के नीचे कैसे फेंक सकता है?

 "सिर्फ एक बेहद बेवकूफ़ लड़का ही ऐसा कर सकता है!" सबने कहा.

कई दिनों तक सब लोग डैडी को चिढ़ाते रहे और पूछते रहे:

 "तेरी नई गेंद कहाँ है?"

सिर्फ अंकल ही उस पर नहीं हँसे. उन्होंने डैडी से हर बात खुलकर बताने के लिए कहा. बिल्कुल शुरू से आख़िर तक. फिर वे बोले:

 "नहीं, तू बेवकूफ़ नहीं है!"

डैडी बहुत ख़ुश हो गए.

 "मगर, तू लालची है और शेख़ीबाज़ है," अंकल ने कहा. "ये बड़े अफ़सोस की बात है. जो लड़का अपनी गेंद के साथ सिर्फ अकेले ही खेलना चाहता है, उसके पास कुछ भी बाक़ी नहीं रहता. ऐसा बच्चों के भी साथ होता है, और बड़ों के साथ भी होता है. अगर तू ऐसा ही रहा, तो तेरे साथ ज़िन्दगी भर ऐसा ही होता रहेगा."


तब डैडी बेहद घबरा गए, और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे, और बोले कि वो लालची और शेख़ीबाज़ नहीं बनना चाहते. वो इतनी देर तक, और इतनी ज़ोर से रोते रहे कि अंकल ने उन पर विश्वास कर लिया और उसे नई गेंद ख़रीद कर दी. ये सच है कि वो गेंद इतनी ख़ूबसूरत नहीं थी. मगर पड़ोस के सारे बच्चे इस गेंद से खेलते थे. ख़ूब मज़ा आता था, और अब डैडी को कोई भी लालची कहकर नहीं चिढ़ाता था. 


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