जैसी करनी, वैसी भरनी
जैसी करनी, वैसी भरनी
"महाराज, मुझ पर रहम कीजिए। कृपया अपने निर्णय पर एक बार पुनर्विचार कीजिए। ऐसा कैसे हो सकता है कि अपना पूरा जीवन मंदिर में दिन-रात माता-रानी की सेवा में बिताने वाला मैं मुख्य पुजारी नर्क में जाऊँ और उसी मंदिर में झाड़ू-पोंछा करने वाला भंगी स्वर्ग में जाए ? महाराज मुझे लगता है कि चित्रगुप्त जी की गणना सही नहीं है। कृपया एक बार फिर से मेरे लेखा-बही की जाँच करवाइए।" पंडित जी ने यमराज से आग्रहपूर्वक कहा।
"पंडित जी, यह मृत्युलोक नहीं है, जहाँ दुबारा गणना से परिणाम बदल जाए। चित्रगुप्त जी की गणना बिलकुल सही है और हमारा निर्णय भी। आप मंदिर में पुजारी जरूर थे, पर आपका ध्यान माता-रानी की सेवा में कम, मंदिर में आने वाले धनाढ्य लोगों की सेवा-खातिर में ज्यादा रहता था। आप जीवनभर इस जोड़-तोड़ में लगे रहे कि कैसे भक्तों की जेब ढीली की जा सके, जबकि ये भंगी हमेशा माता-रानी का ध्यान कर निस्वार्थ भाव से मंदिर की साफ़-सफाई में लगा रहता था। इसलिए जाइए, अब अपना कर्मफल भोगिए।" यमराज ने पंडित जी को नर्क का द्वार दिखाते हुए चित्रगुप्त से कहा, "नेक्स्ट... ?"
