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Raj K Kange

Others


4.5  

Raj K Kange

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दृष्टिकोण

दृष्टिकोण

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लॉकडाउन किसी के लिए भी अच्छा नहीं है लेकिन सुरक्षित रहने केलिए बहुत जरूरी है। लॉकडाउन ने हर किसी की जिंदगी को प्रभावित किया है. कुछ लोगो के लिए तो बहुत ही ज्यादा बुरा अनुभव रहा है। लेकिन लॉक डाउन के अलग अलग पहलुओं पर विचार किया जाये तो पता चलता है कि इसके बहुत सारे अच्छे परिणाम भी देखने को मिले है। यदि मैं अपने निजी अनुभव की बात करुँ तो मैं कह सकती हूँ कि लॉक डाऊन ने बहुत सी चीजों के प्रति मेरे सोचने का नजरिया ही बदल दिया।

मैं दिल्ली जैसे एक बड़े शहर में पली बढ़ी हूं जहाँ शोर शराबा , चमक दमक , ऊंची बिल्डिंगे ही देखने को मिलती हैं। जहाँ शिक्षा , नौकरी , बिज़निस हर क्षेत्र में प्रतियोगिता अपने चरम पर है। गांव की जिंदगी से कोसों दूर यहाँ के लोग सोच भी नहीं सकते की जो महंगी सब्जियाँ वे मार्किट से खरीदते है उन्हें उगाने वाले किसान को उसका सही दाम मिल भी पता है या नहीं। जो अनाज वे खाते है, उसे पैदा करने वाले किसान को कितनी मेहनत करनी पड़ती होगी। मैं दिल्ली में पली बढ़ी जरूर हूँ लेकिन गांव में हमारी भी अच्छी खासी खेती बाड़ी है इसलिए खेती किसानी शब्द मेरे लिए अंजान नहीं है और मैं इस बात से भी अनभिज्ञ नहीं हूँ कि इसमें बहुत ही ज्यादा परिश्रम लगता है। लेकिन मैंने कभी इस काम में लगने वाले परिश्रम को स्वयं महसूस नहीं किया था। क्योंकि हमारे यहाँ खेती के कार्य में मजदूरों की सहायता ली जाती है और उनके साथ हमारे पारिवारिक सदस्य भी काम करते है जो गांव में ही रहते हैं। पढाई लिखाई और काम काज के कारण मेरा ज्यादातर समय दिल्ली में ही बीता है। धान कैसे बोया जाता है , सब्जियां कैसे उगाई जाती है मुझे इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। क्योंकि यह एक कटु सत्य है कि जब इंसान का पेट भरा होता है तब उसका ध्यान उस अनाज की ओर नहीं जाता जिसकी वजह से उसका पेट भरता है। वह अपनी ही दुनिया में मगन रहता है और इन सब बातों को विशेष महत्व नहीं देता। मेरी भी कमोबेश यही स्थिति थी। परन्तु इस वर्ष जब होली में गांव आना हुआ तो अचानक लॉक डाउन होने की वजह से मैं वापस दिल्ली नहीं जा पायी । इन्तजार करती रही कि कुछ दिन बाद लॉक डाउन खत्म हो जायेगा। लेकिन मेरा अंदाजा गलत निकला लॉक डाउन ख़त्म होने की बजाये बढ़ता ही चला गया। ऊपर से टी वी में रोज कोरोना के कहर से हुई मौतों के आंकड़े देख कर मन में डर बैठ गया कि अब तो लॉक डाउन खत्म भी हो जाये तब भी वापस जाना खतरे से खाली नहीं होगा क्योंकि दिल्ली में स्थिति बहुत ही गंभीर थी।

सब कुछ ठीक होने का इंतज़ार करते करते खेती का सीजन आ गया। गांव के लोग अपने अपने खेतों में बुआई की तैयारी में जुट गए। हमारे यहाँ भी खेतों में धान बुआई की तैयारी शुरू हो गयी। मजदूर बुला लिए गए और खेती का काम शुरू हो गया। मेरी माँ खेतों में लगे मजदूरों की हाजिरी लगाने और उन पर नजर रखने रोज़ खेत जाया करती थी ताकि मजदूर ठीक से काम करें। एक दिन मैं ने सोचा कि क्यों न मैं भी जा कर देखूँ कि हमारे खेतों में क्या काम चल रहा है। मैं भी माँ के साथ खेत चली गयी। वहाँ मैंने देखा की आस पास के खेतों में किसान अपने अपने कामों मे लगे हुए है , कोई ट्रेक्टर से अपने खेतों की जुताई कर रहा था कोई हल बैल से। कोई धान बो रहा था कोई अपने खेतों की मेढ़ों को सुधार रहा था। लोग सपरिवार अपने खेतों में काम करने पहुंचे हुए थे। बच्चे भी माता पिता के साथ कड़ी मेहनत कर रहे थे। उनकी छवि भी एक परिपक्व कृषक जैसी लग रही थी। हमारे खेतों में काम करने आयी हुई महिलाएं धान रोपाई के काम में जुटी थीं। घुटने तक कीचड में घुसी हुईं। आसमान में धधकते हुए सूरज और धरती पर घुटने तक कीचड के बीच वे लगातार काम में जुटी हुई थीं। काम करते करते वे आपस में हंसी मजाक भी कर रहीं थी। उनके चेहरे पर न तो थकान के चिन्ह थे और न काम के बोझ से उत्पन्न चिड़चिड़ाहट। उनको देख कर आश्चर्य हो रहा था कि इतनी कठिन परिस्थिति में काम करते हुए भी कोई कैसे इतना प्रसन्न रह सकता है। मेरी दीदी और मेरी भाभी भी धान रोपाई के काम में लगी हुई थीं। उनको देख कर मैंने सोचा क्यों न मैं भी आज देखूँ कि खेत में काम करने का अनुभव कैसा होता है। मैं भी खेत में उतर गई धान रोपाई करने। मैं घुटने तक कीचड में धस चुकी थी। मैंने बाकि लोगों को देख देख कर धान रोपाई शुरू कर दी। खेत में कीड़े मकोड़े भी थे। उनको देख कर डर के मारे मैं कई बार कीचड़ में गिरते गिरते बची और हंसी का पात्र भी बनी. धीरे धीरे मैंने अच्छे तरीके से धान रोपाई करना सीख लिया। उस दिन कड़कती धुप में काम करके मुझे यह एहसास हुआ कि खेती करना भी कोई मजाक नहीं है। झुके झुके काम करते हुए मेरी कमर में बहुत दर्द होने लगा था। मेरे कपडे कीचड में सन चुके थे। मैं पसीने से तर बतर हो चुकी थी। लेकिन मैंने काम बीच में नहीं छोड़ा। जब शाम को घर जाने का वक़्त हुआ तब मेरी जान में जान आयी। खेत से बाहर आने के बाद मुझ में इतनी भी हिम्मत नहीं बची थी कि एक कदम भी चल सकूँ लेकिन फिर भी जैसे तैसे करके मैं घर पहुंची और नहा धो कर फ्रेश हुई। मेरे पूरे शरीर में बहुत तेज़ दर्द हो रहा था। मैं खाना खाते ही सो गयी। उस रात मुझे जो नींद आयी , वैसी नींद शायद ही मुझे कभी पहले आयी होगी।

सुबह माँ की आवाज़ से नींद खुली। 8 बज चुके थे। माँ ने कहा खेती किसानी करने वाले अगर इतनी देर तक सोते रहे तो फिर तो हो गई खेती। उन्होंने हँसते हुए कहा "शौक पूरा हो गया या अब भी बांकि है ?" , "खेती करना बहुत परिश्रम का काम है , तुम जैसे शहरी लोगो के बस का रोग नहीं हैं " उनकी बातों से मुझे लगा , यह सच ही तो है।शहर के लोग दिन भर ऑफिस में काम करने को ही काम समझते है और किसानो को कभी उस सम्मान की नज़र से नहीं देखते। खेती के काम को तुच्छ समझते हैं। किसानो की प्रशंसा सिर्फ नेताओ के भाषणों में ही सुनने को मिलती है, वो भी सिर्फ अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए।मैंने स्वयं भी तो इस कार्य को कभी गंभीरता से नहीं लिया है। आज जब पूरे देश में ऑफिस , कारखाने , शॉपिंग मॉल , स्कूल कालेज सब बंद पड़े हुए है , उस दौरान भी किसान लगातार अपने काम में लगे हुए है ताकि सब लोगो को भोजन मिल सके। क्या हो , अगर किसान खेती करना बंद कर दें , तब लोग क्या हवा खा कर ज़िंदा रहेंगे ? मैं बिस्तर से उठी, फ्रेश हो कर नाश्ता किया और फिर से चल पड़ी उस परिश्रम को अनुभव करने जो मेरे अंदर एक नए दृष्टिकोण को जन्म दे रहा था। धान रोपाई का काम समाप्त होने के बाद मैंने घर की बाड़ी में टमाटर , भिंडी , मिर्च इत्यादि सब्ज़ियाँ उगाने में भी सहायता की। मैं खेती का काम करने में माहिर तो नहीं बनीं लेकिन काफी कुछ सीख लिया और इसमें लगने वाले परिश्रम को भी महसूस किया और साथ ही उस डर और बेचैनी को भी जो एक किसान तब महसूस करता है जब फसल बोने के बाद बारिश नहीं होती और कठिन परिश्रम से बोयी गयी फसल के बर्बाद होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। लॉक डाउन के दौरान ही मैंने स्टोरी मिरर जैसे डिजिटल प्लेटफार्म के बारे में जाना जहाँ बेहिचक अपनी रचानाओं को लोगो के साथ साझा किया जा सकता है। मुझे बचपन से ही थोड़ा बहुत लिखने का शौक है लेकिन मुझे पहले कभी ऐसे किसी माध्यम की जानकारी नहीं थी जहाँ अपनी लिखी हुई कविताओं और कहानियों के बारे में अनुभवी लोगों की राय जानने का मौका मिले ,और जिससे लेखन में और अधिक परिपक्वता लाने में मदद मिल सके। साथ ही स्टोरी मिरर पर ढेर सारी प्रतियोगिताए भी कराई जाती है जो कि बहुत ही बढ़िया है , इससे नए लेखकों को काफी प्रोत्साहन मिलता है और अपनी लेखन क्षमता को परखने का मौका भी। लॉक डाउन की वजह से जहाँ मेरे अंदर कृषि के प्रति एक नए दृष्टिकोण का जन्म हुआ वही दूसरी ओर स्टोरी मिरर के रूप में एक नए मित्र से मुलाकात हुयी जिसके साथ मैं अपनी भावनाओ को लेखन के माध्यम से साझा कर सकती हूँ।



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