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Lakshman Jha

Others


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Lakshman Jha

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बाल -बाल बच गए

बाल -बाल बच गए

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एक दस साल का बच्चा दौड़ा -दौड़ा मेरे पास आकर जोर -जोर से रोने लगा। वह डरा और सहमा हुआ था। हमें कसकर पकड़ लिया और करूण स्वर में कहा ..

"भैया ..मुझे बचा लीजिए ..यह आदमी मुझे अपने साथ इस प्लेटफोर्म से उस प्लेटफोर्म तक 1 बजे रात से घूमा रहा है और मुझे छोड़ता भी नहीं है।"

हम इस लड़के को पहचान गए, हमारे पड़ोस में ही यह रहता था। इतने में वह आदमी मेरे पास आया

"चलो ..चलो मेरे साथ चलो! "

हमने पूछा ..

"क्या बात है ?"

उसने आरोप लगाया ..

"इसने हमारा पैसा और कम्बल चुराया है! "


उसके इल्जाम झूठे थे क्योंकि अरविन्द को हम व्यक्तिगत रूप से जानते थे। हमने आव देखा ना ताव अपने चप्पल को निकला और स्टेशन में ही उसको पीटने लगे। लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गयी। कुछ और भी लोग जान गए और हमारा साथ दिया। फिर क्या था उसने अरविन्द के कन्धों से कम्बल लिया और नो दो इग्यारह हो गया


अरविन्द 9 या 10 साल का होगा। हम उनके परिवार को भली भांति जानते थे

"आखिर यह सब हुआ कैसे ?"

हमने अरविन्द के आँसू पोछे और खोमचे वाले से मूंगफली ख़रीद कर उसे दिया। स्टेशन पर रात का ही माहौल था पर सुबह के तीन बजे थे


अरविन्द को बचपन से फिल्म देखने का शौक था। छोटे से शहर में दो पिक्चर हॉल थे। उन दिनों हॉल में पुराने फिल्म लगा करते थे। भागलपुर "जवाहर टाकीज" में फिल्म " संगम " लगा था। यह शहर 110 किलोमीटर दूर था। एक बस ही भागलपुर " बंदेमातरम " जाया करती थी। किराया मात्र दो रुपये थे।आना जाना मात्र चार रुपये। और दो रुपये फिल्म देखने का


अपनी नानी से उसने किसी तरह 8 रुपये लिए और दूसरे दिन सुबह 10.30 को " बंदेमातरम " बस में बैठकर भागलपुर चल दिया। रास्ते में बस रुकते -रुकते आखिर शाम 4.30 को भागलपुर पहुँच गयी। पहले वह नाथनगर जवाहर टाकीज गया। परन्तु टिकट सारे बिक चुके थे। हॉल हाउस फुल था

अरविन्द निराश हो गया। पर स्टेशन के पास एक और सिनेमा हॉल था। उसमे फिल्म " चा चा चा " लगी हुयी थी।" अजंता टाकीज "में नाईट शो फिल्म देखने के बाद वह स्टेशन आ गया। वह अपने सुबह का इंतजार कर रहा था। स्टेशन में घूमकर अपना समय बिताना चाहता था


कोई अचानक आकर तहकिकात करने लगा ..

"ये ..कहाँ घूम रहे हो ?..इधर आओ ..तुम्हारे पास टिकट है ?"

उसकी आवाज़ में आक्रोश रहा। अरविन्द डर गया। शायद यह पुलिस का आदमी या रेलवेज का आदमी होगा। अरविन्द के रुकने के बाद उसने फिर पूछा

"क्या नाम है तुम्हारा ?..घर कहाँ है ? क्या करने आये थे ? "

इन प्रश्नों के बौछारों ने अरविन्द को हिला दिया। उसने पूरी बातें कह डाली

उस अजनबी ने सारी बातें सुनकर फिर कहा....

"देखो अरविन्द !..कल यहाँ एक खून हुआ है। पुलिस तलाश कर रही है। तुम मेरे साथ रहो ..मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा ..यह सारा स्टेशन हमारे देख -रेख में है "

अरविन्द डर गया और उसके साथ हो लिया


पर उसकी गतिविधियों पर अरविन्द नजर रखने लगा। उसने अपना कम्बल अरविन्द को सौंप दिया। अब जहाँ- जहाँ वो जाता था अरविन्द को इस प्लेटफोर्म से उस प्लेटफोर्म ले जाता था

अचानक अरविन्द की निगाह हम पर पड़ी और हम अरविन्द को उसके चंगुल से आज़ाद करवा दिए

अब अरविन्द के आँसू रुक नहीं रहे थे !... वह अपनी करुणामयी भंगिमा से हमें आभार व्यक्त कर रहा था !....इस तरह नया सवेरा हुआ !.... काली रात की काली बातें नए किरणों के साथ विलुप्त होती चलीं गयीं !!



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