यादों का सफर
यादों का सफर
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जनवरी की सर्दी
और ट्रेन का सफर
खुलती हुई खिड़की
और ठंड का कहर,
इसके बीच में
चलता जा रहा हूं
अपने कर्मपथ पर
तेरी बातों के संग।
हां , जानता हूं मैं
तू सो रही है रजाई में
बंद किए हवा के दरवाजे ,
पर तुझे भी
यह मालूम नहीं
कि तू चल रही है
मेरे संग संग में
इस सुहाने सफर में।
वो सफ़र , जो शुरू हुआ है
अभी अभी लेकिन
चलेगा सदियों तलक
बिना रुके , बिना थके
तुझे साथ लेकर
वहां तक ,
जहां मिलते हैं
धरती और आसमान
और हो जाते हैं
एकाकार क्षितिज पर।
