उड़ना चाहती हूँ
उड़ना चाहती हूँ
1 min
191
उड़ना चाहती हूँ खुले आसमान में
लेकिन बंदिशों से जकड़ी हूँ।
अपना नाम बनाना चाहती हूँ
लेकिन बदनामों में लटकी हूँ।
खूब लूटा समाज ने मुझ को
फिर भी घिसट- घिसट कर उभरी हूँ।
जान नहीं है इस जान में
फिर भी हौसला के लिए अटकी हूँ।
अंत में आ गया समझ मुझको
कोई नहीं है यहाँ मेरा
फिर क्यों घुट -घुट कर मरती हूँ।
