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Manoj Kumar

Others

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Manoj Kumar

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तुम क्या ढूँढती हो राख़ में

तुम क्या ढूँढती हो राख़ में

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जल गया आशियाना मेरा।

अब धुएं हैं चारों तरफ़।।

मेरी मुहब्बत तो है तेरे ही साथ।

पर आँच के लपटे हैं चारों तरफ।।


ना अब मेरा कोई रहा।

ना मैं किसी के हो सका।।

कलम जब तक चलती रही कोरे कागज़ पर,

मेरा चिन्ह उसी पे हो सका।।


क्या मैं दिया क्या लेकर जा रहा हूं।

प्यार किया और प्यार भी छोड़ दिया।।

 हम मौला के बन्दे हैं, कागज़ बनकर राख हुआ।

 मुझे क्या ढूंढ रही हो इन राख में, मैं हवा बनकर चल दिया।।


अगर नशा हैं तेरे इन मुहब्बत में।

 तो मैं इस नहीं, पर अगले जनम में आऊँगा।।

 प्यार कभी मरता नहीं हैं साथी।

 तुम रोना मत मैं ज़रूर आऊंगा।।


 ये दुनिया हरजाई हैं, लेकिन मेरा प्यार नहीं।

 जो वादें हैं हम दोनों के , ये बातें बहुत सच्ची हैं।।

 तुम कितने दिनों तक प्यार करोगे मुझसे।

 हम मिलेंगे नहीं तुझे, जो हैं तेरे सामने वहीं राख बची हैं।।


 कोशिशें तुम जारी रखो, पर कोई फायदा नहीं।

 जो आशियाना जल गया, अब कभी नहीं आऊँगा।।

 रोकर तू पोछं लेना ऑंसुओं को, अपने आँचल में।

 क्या ढूंढ रही हो राख में, देखकर ही रुलायेगा।।


 अब तो तेरी उजड़ गई बस्तियाँ, मैं तो आजाद हो गया।

 अरे प्यारी डूबी तेरी किश्तियाँ, गहरे पानी में।।

 मैं तुझे छोड़कर चला गया, जाने वो कौन सा देश।

 तुम तो रो रोकर बावरी हो जाओगी, भरी जवानी में।।



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