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Pawanesh Thakurathi

Others


4.9  

Pawanesh Thakurathi

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स्याही-ताल पर थिरकने वाले कवि

स्याही-ताल पर थिरकने वाले कवि

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ए स्याही-ताल पर 

थिरकने वाले कवि 

लौट आ 

कि अभी बाकी है

दवात में स्याही।


ए उजले दिनों के 

आकांक्षी कवि 

लौट आ 

कि अभी जारी है

उजले दिनों की तलाश।


ए 'कटरी की रूकुमिनी' की 

कथा लिखने वाले कवि 

लौट आ 

कि अभी भी गरज रहे हैं

घन-घमंड के

फट रही है नभ की छाती

और कर रहा है

मानव जीवन

चिलबिल-चिलबिल...!


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