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Devkaran Gandas

Others

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Devkaran Gandas

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संवेदनहीन मानव

संवेदनहीन मानव

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सुबह से लेकर शाम तक और

फिर शाम से लेकर सुबह तक

मानव जी रहा है यांत्रिक जीवन ,

वो सुबह उठता है यंत्रों के साथ

और रात को सोता है यंत्रों के संग ,

अब उसके लिए बेमतलब हो गई है

सुबह सवेरे पंछियों की कलरव 

और बेमानी हो गई है पशुओं के संग 

अपने घर को लौटती सुहानी शाम ।

इन यंत्रों से भरे जीवन में मानव ने

खो दी है अपनी मानवी संवेदना ,

इसका जीता जागता उदाहरण है

संवेदनहीन मानव के कुकृत्य 

जहां वो शिकार कर लेता है

एक नन्ही अबोध बच्ची का 

और नहीं बख़्शता है बुजुर्ग को भी ,

अब उसके लिए कलरव बन गई है

उस अबोध बालिका की चीत्कार

और रिश्तों का बहता हुआ खून

बन गया है घर लौटती शाम ।


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