संवेदनहीन मानव
संवेदनहीन मानव
सुबह से लेकर शाम तक और
फिर शाम से लेकर सुबह तक
मानव जी रहा है यांत्रिक जीवन ,
वो सुबह उठता है यंत्रों के साथ
और रात को सोता है यंत्रों के संग ,
अब उसके लिए बेमतलब हो गई है
सुबह सवेरे पंछियों की कलरव
और बेमानी हो गई है पशुओं के संग
अपने घर को लौटती सुहानी शाम ।
इन यंत्रों से भरे जीवन में मानव ने
खो दी है अपनी मानवी संवेदना ,
इसका जीता जागता उदाहरण है
संवेदनहीन मानव के कुकृत्य
जहां वो शिकार कर लेता है
एक नन्ही अबोध बच्ची का
और नहीं बख़्शता है बुजुर्ग को भी ,
अब उसके लिए कलरव बन गई है
उस अबोध बालिका की चीत्कार
और रिश्तों का बहता हुआ खून
बन गया है घर लौटती शाम ।
