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Meena Mallavarapu

Children Stories Inspirational

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Meena Mallavarapu

Children Stories Inspirational

परिपक्वता की ओर

परिपक्वता की ओर

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छोटा सा बच्चा , होगा कोई आठ दस साल का

थी उस बेचारे की उलझनें हज़ार 

अब फुर्सत किसे इतनी कि रखे 

कोई ,हिसाब किताब उसके हर दिन के हाल का


काफ़ी समय से चल रहा था संघर्ष उसके मन में

समझ न पा रहे थे उसके घर के सदस्य 

क्यों हो गया है आजकल इतना चुप

क्यो चिड़चड़ापन नज़र आता है उसके जवाबों में


क्या-क्या चल रहा होगा उस बालक के मन में-

जो वह ख़ुद भी नहीं जानता 

औरों को क्या समझाए

नहीं दिखती अब फुर्ती चुस्ती उसके तन बदन में


बेमन से खाना खाए ,उदासीन खेल कूद से

मुस्कान जैसे हो गई उससे ख़फ़ा

हंसी खुशी जैसे हो गई रफ़ा दफ़ा

पता तो चले क्या गुज़र रही है उस के मन पे


समझदार वह मां जो जान गई  इतना 

कि उसका लाडला गुज़र रहा है

उस मुकाम से जहां है सख़्त ज़रूरत

मिले सही सलाह -प्यार भरी, दुलार भरी


अकारण तो बच्चा हो नहीं सकता इतना दुखी

कुछ तो होगा जो कर रहा उसे विचलित 

है उसे समझने और समझाने की दरकार

पास बुलाया, प्यार जताया , बातों से रिझाया


खेल खेल में पूछा स्कूल और दोस्तों के बारे में

कक्षा के बाकी बच्चों के बारे में

बातों बातों में देखा जब उसकी ओर

नज़र आया बदलाव एकाएक उसके चेहरे पे


अंकुश है उस लड़के का नाम जिसे प्यार करते सब

क्लास में सभी मानते हैं उसे अच्छा

लीडर भी वही , सब का दोस्त वही

मैं नहीं जानता क्यों ,मुझे नहीं लगता भला यह सब


मां ने गले लगाकर समझाया कि कोई भी हो

अगर  हो अच्छा , सच्चा, मेहनती

पढ़े लिखे मन लगाकर, हो गर विनम्र 

पायेगा प्यार  हर किसी से , कहीं भी हो


अब तुम उससे रहोगे दूर दूर ,नाराज़, खिंचे खिंचे 

तो रहेगा क्यों नहीं दूर तुम से वह भी  

क्या उसने किया तुम्हारा बुरा कभी

जो मन के दांत रखते उसके प्रति भींचे भींचे


सोचो उसकी गलती क्या है ,क्यों सब करते हैं उससे प्यार 

तुम क्यों हो उससे यूं नाराज़ ,सोचो ज़रा

कभी मुस्कुराए देख उसे , सोचो ज़रा

उसकी दोस्ती का हाथ किया कभी स्वीकार ?


हो तुम अपनी जगह पर मेहनती , सौम्य ,सुशील

वह अपनी जगह पर-जिसको जो मिले मिले

दोस्ती में जगह नहीं है इन मुद्दों  की

वह  तो बस  ढूंढे  स्नेह , प्यार  और एतबार 


"कल ही तो है अंकुश का जन्म दिन,है सब को बुलाया घर

मैं नहीं चाहता जाना उसके घर,दोस्त नहीं वह मेरा-"

"माना बेटे,दोस्त नही था तेरा-पर अब बन जाएगा 

कल देना जन्म दिन की उसे बधाई,ज़रूर मिलाना हाथ


देना उसे यह छोटा सा तोहफ़ा, शऊर से आना पेश

उसके मम्मी पापा से,घर के छोटे बड़ों से

बढ़ाओ उस की तरफ़ दोस्ती का हाथ

देखो तो सही होता है क्या "-हुई पेश जब मां की बात


मन मे हुई ज़रा सी हलचल, जगा ज़रा उत्साह

मगर लगी अच्छी मां की बात

छोटा सा तोहफ़ा मां बेटे ने

मिलकर रंगीन कागज़ रिब्बन से किया पैक


दूसरे ही दिन था शाम का कार्यक्रम, 

गया कुछ सकोंच लिए मन में

मगर घर लौटा जब,थी चेहरे पर चमक

लगता था मिल गया उसे एक नया दोस्त 


चहक रहा वह लाडला "मम्मी,अंकुश के मम्मी पापा 

कह रहे थे कि अंकुश का यह दोस्त 

है कितना प्यारा, कितना अच्छा 

और हम सब ने मिलकर खेला खूब ,खाया भी खूब


उस रात की नींद उस बच्चे की थी गहरी

मन से निकल गया विकार

नई दोस्ती का ,नए सोच का

अब  हुआ  उसके  हृदय  में संचार!



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