"पराई स्त्री-एक तुच्छ सोच"
"पराई स्त्री-एक तुच्छ सोच"
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बचपन बीता जिस आंगन में
जिसमें खेले खेल निराले,
अपनेपन की यादों में विस्मृत करके,
ख़्वाब वो सारे भरने को ऊँची उड़ान ,
नए कदम फिर उठाए थे ,
तिनकों की राहत से
स्वप्न जो साकार किया
मिट्टी में भी जान भरकर
एक नया आकार दिया।
जब जागी तृष्णा मंज़िल की
उस ओर कभी बढ़ने लगे
हर रूप में भी सहज बनके
ध्यान प्रतिपल रखने लगे
भटके हुए वो लोग सभी
जो न समझे स्त्री को कभी
सब घर की परवाह जो करती
फिर उसको क्यों पराई है
ये कहते वो हैं तुच्छ सोच के इंसा
जो कहते....पराई है महिला।
