पिता
पिता
कविता
पिता
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जब-जब भी लगी ठोकर तो,
किसको पुकारा है ।
बेशक वो पिता है जो,
हमदर्द हमारा है।।
*
बच्चों के लिए जिसने,
जीवन लुटाया सारा।
बन कर रहा है गीता,
कुरान का जो पारा।।
जीवन के हर भंवर में,
उभरा जो बन किनारा।
लेकिन जुबां न खोली,
गूंगा रहा बिचारा।।
दुनिया का हर खिलौना,
यू किसने संवारा है ।
बेशक वो पिता है जो,
हम दर्द हमारा है ।।
*
कब अपना जेब उसने,
अपना ही फकत माना।
तस्दीक कर रहा ये,
सदियों से ही जमाना।।
बच्चों को शरण किसने,
दी है दिया ठिकाना।
सबके लिए पिता का,
हाजिर है आशियाना।।
बच्चे रहें सलामत ये,
किसने विचारा है ।
बेशक वो पिता है जो,
हम दर्द हमारा है ।।
*
खुशियां पिता की दासी,
बनकर रही है घर में।
कांधों पे चढ़ पिता के,
आता मजा सफर में।।
पकड़े हो अगर उंगली,
बच्चा पिता की कर में।
बेताज का वो राजा,
होता है शहर भर में।।
बच्चों को दिया किसने,
खुशियों का पिटारा है ।
बेशक वो पिता है जो,
हम दर्द हमारा है ।।
*
एहसान कर पिता कब,
एहसान जताता है।
कांधों का बोझ अपने,
कब किसको बताता है।।
जां दे के भी जो अपने,
बच्चों को हंसाता है।
मर कर भी कहां मरता,
हर चोट वो खाता है।।
दुश्वारियों के सागर का,
कौन किनारा है ।
बेशक वो पिता है जो,
हम दर्द हमारा है ।।
*
कदमों के तले मां के,
जन्नत है बराबर है।
मां बच्चों के जीवन की,
ताकत है बराबर है।।
ममता की जिंदगी को,
जरूरत है बराबर है।
कर्जे से दबी मां के,
हर छत है बराबर है।।
पर कौन है जो मां का,
पगपग पे सहारा है ।
बेशक वो पिता है जो,
हम दर्द हमारा है ।।
*
बच्चों की चोंट की जो,
हर पीर जानता है।
लेकिन जो बंधी पग में,
जंजीर जानता है।।
बच्चों की नफरतों को,
जागीर जानता है।
अपमान के शौलों को,
तकदीर जानता है।।
साबिर है कौन किसका,
कांटों पे गुजारा है ।
बेशक वो पिता है जो,
हम दर्द हमारा है ।।
*
हर लम्हा जिंदगी का,
बच्चों को दे दिया है।
हर दुख सहा है जिसने,
हर गम सदा पिया है।।
इज्जत बचाने वाले,
हर काम को किया है।
दामन को अपने चाहे,
सो बार सी लिया है।।
थकहार कर भी किसने,
मैदान को मारा है ।
बेशक वो पिता है जो,
हम दर्द हमारा है ।।
*
समझो तो मशवरा है,
समझो तो इशारा है।
करलो पिता की खिदमत,
सच्चा ये सहारा है।।
साये में सदा जिसके,
संसार ये सारा है।
जो मील का पत्थर है,
नायाब मीनारा है।।
वो नाखुदा है कांटों को,
किसने बुहारा है ।
बेशक वो पिता है जो,
हम दर्द हमारा है ।।
*
जिस दिन पिता ना होंगे,
"अनंत "रोओगे तुम।
साये में किसके जाके,
बेखोफ सोओगे तुम।।
खिदमत नहीं करी तो,
दामन भिगोओगे तुम।
संपन्नता में रहकर भी,
चैन खोओगे तुम।।
सोचोगे स्वर्ग का सुख,
ये किसने उतारा है ।
बेशक वो पिता है जो,
हम दर्द हमारा है ।।
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अख्तर अली शाह "अनंत"नीमच
9893788338
