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AJAY AMITABH SUMAN

Others

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AJAY AMITABH SUMAN

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मृग तृष्णा

मृग तृष्णा

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मृग तृष्णा समदर्शी सपना ,

भव ऐसा बुद्धों का कहना।

था उनका अनुभव खोल गए, 

अंतर अनुभूति बोल गए।

..........

पर बोध मेरा कुछ और सही, 

निज प्रज्ञा कहती और रही।

जब प्रेमलिप्त हो आलिंगन, 

तब हो जाता है पुलकित मन।

..........

और शत्रु से उर हो कलुषित ,

किंतु मित्र से हर्षित हो मन।

चाटें भी लगते हैं मग में , 

काँटें भी चुभतें हैं पग में।

..........

वो हीं जाने क्या मिथ्या डग में,

ऐसा क्यों कहते इस मग में?

पर मेरी नज़रों में सच्चा , 

लहू लाल बहता जो रग में?



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