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Munendra Parashar

Others

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Munendra Parashar

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मैंने अपने आज को जला दिया

मैंने अपने आज को जला दिया

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मैंने अपने आज को जला दिया कल को संभालने के खातिर।

रात गुजर गई सो ना सका कल क्या होगा ये सोच सोच कर।


जो था पास उसको जी ना सका कुछ और पाने कि चाहत में।

सब छूट गया मेरा कुछ कर गुजरने की चाहत में।


कुछ समय में करवट ली और कुछ मेरी तकदीर ने हर पल अपनी तकदीर को कोसता रहा और अपने लिए फैसलों पर अफसोस करता रहा।


लत इसी लगी कुछ कर गुजरने की की सब कुछ गवां दिया।

इस लत ने सब छीन लिया मेरा घर छीना अपने छीने परायों के मेले में ला कर खड़ा कर दिया।


अब मूड कर देखता हूं तो बेगाने चेहरे नजर आते है जिसको नजरें ढूॅंढ रही है वो कोसों दूर नजर आते है


जिंदगी ठहरी हुई है और वक्त निकलता जा रहा है।


और मैं वक्त के साथ चलूं तो अपने छूट रहे है।

अगर अपनों के साथ चलूं तो वक्त छूट रहा है।


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