STORYMIRROR

Thakur Sakshi Raghav

Others

3  

Thakur Sakshi Raghav

Others

लम्हे ज़िंदगी के

लम्हे ज़िंदगी के

1 min
226

लम्हे ज़िंदगी के क्यूं

खुल के जी नहीं पा रही

जो बस कुछ पल का या फिर यूं कहूं एक पल 

के लिए भी नहीं था मेरा फिर भी ना जाने अपने 

हर पल को उस को दिए जा रही हूं 


कुछ टूटा भी नहीं कुछ छूटा भी नहीं

फिर ना जाने क्यूं हर खुशी के पल को छोड़ के जीये

जा रही हूं 


ना जाने लम्हे ज़िंदगी के क्यूं खुल के जी नहीं पा रही हूँ


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन