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Dr.Pratik Prabhakar

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Dr.Pratik Prabhakar

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कोई रात बनाता

कोई रात बनाता

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जानते हो

आसमान से

कोई फव्वारा चलाता

जिससे होती बारिश

कोई फूँक मारता तो

चलती हवा।

कोई दिन बनाता

कोई रात

कोई खा जाता चाँद

को धीरे धीरे

बनाता कोई नित

नए तारे आकाश में

मुझे यकीन है

आप मानो या न मानो


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