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ख़ुदा की थोड़ी सी बात समझी है

ख़ुदा की थोड़ी सी बात समझी है

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आकार देख इन राशियों के तारों की जगह समझी है

तैर कर समुंदरों में अब किनारों की वजह समझी है

चंन्द्रहीन रातों में जाग कर शशी की रात समझी है

पूरी नहीं लेकिन ख़ुदा की थोड़ी सी बात समझी है


पंछी को देख आसमान में उसकी उड़ान समझी है

सपूत हूँ उस माँ का जिसने मेरी भोली ज़ुबान को समझी है

बैठकर इन सरहद पर वीरों की जान समझी है

तिरंगे के हर रंग में मैने भारत की शान समझी है


सूखी पड़ी ज़मीन पर वो पहली बरसात भी समझी है

पूरी नहीं लेकिन ख़ुदा की थोड़ी सी बात तो समझी है


पन्ने पलट कर फिर पुराने किस्सों की याद समझी है

प्रेमी बनकर प्रीत से पहली मुलाकात समझी है

गाती हुई कोयल की वो मीठी आवाज़ भी समझी है

बसंत मे यूं मुस्कुराते मौसम की बहार भी समझी है

ताज़ा ताज़ा कलीयों में मकरंद की खुशबू समझी है

वहीं गुनगुनाते भवरों की कुछ गुफ्तगु भी समझी है

पर्वत में बहती नदिया की बहती सौगात भी समझी है

पूरी नहीं लेकिन ख़ुदा की थोड़ी सी बात तो समझी है


सहस्त्र हार के बाद भी एक जीत की आस समझी है

कर्ज मे डूबे शख्स की जहर की प्यास भी समझी है

शतरंज खेल वक्त के संग उसकी एक चाल भी समझी है

खेलते खेलते अगली बाज़ी अपनी औकात भी समझी है

मानता हूँ कि इस जहाँ में मैने हर चीज को समझी नहीं

जितनी भी समझी उतने में ही ये जिंदगी खास समझी है


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