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YAMUNA DHAR TRIPATHI

Others

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YAMUNA DHAR TRIPATHI

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कैसे निखरें..!

कैसे निखरें..!

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सरल नहीं है जीवन अपना,

पग-पग पर हैं काँटे बिखरे।

खींच रहे हैं लगा युक्तियॉं,

बोलो अब हम कैसे निखरे?


जिसको मन ने अपना माना,

मुझको उससे घात मिला है।

कृत्य किया है उसने ऐसा-

मन का दृढ़ विश्वास हिला है।।

अंतर्मन को ठेस लगी है,

उन पर आखिर न क्यों बिफरे।

खींच रहे हैं लगा युक्तियॉं,

बोलो अब हम कैसे निखरे?


मैंने त्याग किया है इतना,

जिसका कोई मोल नहीं है।

दुष्चक्रों का ताना-बाना,

उनका केवल काम यही है।।

अट्टहास से उनके डरता,

रोष से हम सब आज हैं सिहरे।

खींच रहे हैं लगा युक्तियॉं,

बोलो अब हम कैसे निखरे?



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