STORYMIRROR

Debashish Nandan

Others

3  

Debashish Nandan

Others

ज़िंदा हूं

ज़िंदा हूं

1 min
18

जीने को और क्या चाहिए

सर पे छत है थाली में रोटी है

जेब में पैसे हैं कपड़े हैं लत्ते हैं

ठीक ही तो है! ज़िंदा हूं।

दिनभर मेमे देख कर हंस लेता हूं

कमरे की दीवारें निहार लेता हूं

कोई पूछ ले हाल कैसा है

तो कह देता हूं ज़िंदा हूं।

पंखे की आवाज़ है टीवी का शोर है

गाड़ियों की चें पें है कभी ट्रेन की पोंपों है

एक बिस्तर है, उतना नरम नहीं है

पर लेटकर ये आवाज़ें सुनकर लगता है

हां, ज़िंदा ही हूं।



Rate this content
Log in