जी पाएं हम
जी पाएं हम
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हर हसरत ना हो पाई पूरी
हर आरज़ू रह गई अधूरी
देखे थे जो ख्वाब सभी
टूटे बिखेरे है आज सभी
न जाने को सा गुनाह हुआ है
सजा जिसकी ना हुई अब तक पूरी!!!
मिल जाए गर वो खुदा यार कभी
बस करना है उससे सवाल यही
क्यू ऐसी तकदीर बनायी
न लिखी उसमे एक भी अच्छाई
गर हुई है गल्ती हमारी
तो क्यों ना दे दी हम रिहाई।
न मांगा कभी की कोई महल हो
न चाहा कभी की बेहद दौलत हो
बस चाहा की हो एक छोटी सी कुटिया
जिसमे हो सुकुन की कमाई
खुश रहे और खुश रखें
यही तो बस थी दुहाई।
करदे ए खुदा कुछ तो करम अब
न भले ही दे तू जनम अब
पर इस जन्म में दे दे इतनी खुशी बस
की कट जाए ये उमर सुख से अब
सुकुन दे इतना सा अब
की बस, जी पाएं हम!!!!
