हिंदी है माथे की बिंदी
हिंदी है माथे की बिंदी
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कलमकारों की श्रृंगार है हिंदी।
साहित्य की लाडली है हिंदी।
अलग नहीं कर सकता कोई,
भारतवासियों के हर जुबां पर हिंदी।
हर वाद्य में जो निकले शब्द,
संगीत की देवी है हिंदी।
कलाकार भी इससे श्रृंगार करते ,
उनके है माथे की बिंदी।
हर वाणी से शुरुवात होती है हिंदी,
सबके गले को सजाती हैं।
प्रणाम है मेरी मातृभाषा को,
वो अच्छे - अच्छे को ज्ञान बताती हैं।
