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Rishika Inamdar

Abstract Drama Romance

2.5  

Rishika Inamdar

Abstract Drama Romance

गीले अरमान

गीले अरमान

1 min
224


आज फिर अपने गीले अरमानों को 

अपने धुले हुए कपड़ों के साथ 

बरामदे में दाल के घर से निकली हूँ


आज फिर मौसम की आँखों में देखा 

उसका मन  भी कुछ भारी भारी सा था 

मैंने कहा उस से संभल जा

कुछ भी हो पर बरस ना

बरसे गई तो तकलीफ़ मुझे भी होगी 


लौट कर मगर जब देखा 

वह तो बरस कर हवाओं के साथ आगे बढ़ गयी 

मेरे आंगन को समेट ने का काम बढ़ा  कर चल दी 


हाय मेरे गीले कपड़े ! 

वह तो खैर 

खाट के कोने पर 

पंखे के नीचे सूख जायेंगे 

इन् गीले .. भारी अरमानों को …

सिराहने पर जगह दे दी मैने 


गीले अरमानों को सिराहने पे 

रख कर कोई सोये भी तो कैसे 

आँखों से बहता रहेगा पानी तो 

नींद आएगी कहाँ से 

रात भर उम्र के इस रुत को देती रहूँगी गाली 

कोसती रहूँगी जो भी आये ज़ुबानी 

रात काटते काटते कटी 


लो भोर भया .. धूप निकली ..

और आँगन फिर खिला 

आज फिर अपने गीले अरमानों को 

बरामदे में डाल के घर से निकलूंगी …


सूरज से कहूँगी मेरी तड़प से 

अपनी ताप जगाये 

मेरे सीने में जो लगी है 

वह आग अपने सीने से लगाए ..

मेरे उम्मीदों की तेज से 

सुनेहरा कर दे जहां 

आज इतना बिखरे 

के सूख जाये  मेरे गीले गीले अरमान!


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