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ग़ज़ल

ग़ज़ल

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दरिया ख़फ़ा है मैंने उसे काम लिख दिया
साहिल की रेत पर जो तेरा नाम लिख दिया।
मौजों की कोशिशें भी जब ,नाकाम हो गईं 
हैराँ है मैंने कैसे, सरेआम लिख दिया।
चन्दा की  चांदनी को भी, तेरी तलाश थी
मैंने पता दिया तेरा, गुलफ़ाम लिख दिया।
चर्चे तो हर जगह थे, तुझको खबर न थी
मजबूर होे मैंने तुझे ,पैगाम लिख दिया।
बहती हवा ने हर जगह ,बदनाम कर दिया
अपने ही सर पे मैंने ये, इल्ज़ाम लिख दिया।


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