एक था परिंदा
एक था परिंदा
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एक था परिंदा , उड़ने को बेकरार,
पर कैद की बहुत मजबूत थी दीवार,
पंख खोलकर उड़ने की कोशिश वो रोज़ करता,
फिर थक कर हार जाता,
कभी दो आँसू भी बहाता,
बस अपनी आज़ादी को ही तरसता रहता,
रोज़ की कोशिशें होने लगी जब बेकार,
उसने भी छोड़ दी आज़ादी की पुकार,
फिर एक दिन एक नन्हा बच्चा आया,
उसने खोल दिया पिंजरे का दरवाज़ा,
पर परिंदा समझ ही नहीं पाया,
उसे आज़ादी का मिला था सुनेहरा मौका,
फिर क्यों वह उड़ ही नहीं पाया,
शायद कैद होना आ गया था उसे रास,
उसने खो ही दी थी हमेशा के लिए उड़ने की आस!
