डाकिया
डाकिया
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दूर से आया, पास से देखा
साइकल चलााते हुए
हरफ़नमौला डाकिया
टिन..टिन..घंटी बजाते ,
चिट्ठियों का झोला लेकर
कच्ची-पक्की सड़कों पर
गली, मुहल्ले, नुक्कड़ से गुजरा
स्नेह, उल्लास, दुःख से भरी
अंसख्य डाक कि गठरी लेकर ,
दूर दराज रिश्तों में घुलता रहा
हृदय की भावना खोलता रहा
खट्टी-मीठी बातें बोलता रहा
सुंदर सपनें नैनों में टटोलता रहा
इंतज़ार की राहें खत्म करता रहा ,
डाकिया डाक लाया, मन की बात लाया
खुशियों का पैगाम लाया, जिंदगी का रंग लाया!
