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Jyoti Khare

Others

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Jyoti Khare

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बूंद

बूंद

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आसमान की छत पर

उबलता हुआ जीवन

भाप बनकर जैसे ही

चिपकता है 

काले सफ़ेद बादल

घसीट कर भर लेते हैं

अपने आगोश में 

फिर भटक भटक कर 

टपकाते हैं

पानीदार बूंद


देखते हैं

धरती की सतह पर

भूख से किलबिलाते बच्चों के चेहरों पर 

उम्मीदों की लकीरें 

प्रेम की छाती पर 

विश्वास,अविश्वास के रंगों से लिखे पत्र

दरकते संबंधों में बन रही

लोक कलाकारी

और दहशत में पनप रहे संस्कार

इस भारी दबाव में

टपकाते हैं

जीवनदार बूंद


बूंद खामोशी से

खोंदी,कुचली ज़मीन को

कर देती साफ

कटे हुए पेड़ों को कर देती है हरा


बूंद

तुम्हारे कारण ही

धरती पर जिंदा है हरियाली

जिंदा है जीवन-----



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