बहुरूपिया
बहुरूपिया
उसे देखा था बचपन में
तरह तरह के भेस बनाता
आता जब बाज़ार में
तो सभी की निगाहें उसकी ओर उठ जातीं
कौतूहल से सभी देखते
कभी विस्मय से
कभी उसकी कलाकारी के लिऐ
भाव उठता प्रशंसा का भी
क्योंकि उसका रूप
सजीव होता बोलता हुआ
जो कि वह बोलता नहीं था
कभी लाल जीभ बाहर निकाले
गले में मुण्डमाला, कौड़ियों की माला डाले
बाँऐंं हाथ में खप्पर
लाल रंग में भरा गोया ख़ून
दाँऐंं हाथ में तलवार
पैरों में घुँघरू बाँधे
काले कपड़ों में
लम्बे बालों और
काली आँखों वाला वह
जब किसी दुकान पर आता
जहाँ मैं मौज़ूद होता पहले से
काॅपी या किताब की ख़रीदारी को
या कोई किताब या पत्रिका को उलटते-पलटते
तो मैं सहम जाता
और दुकान के अन्दर खिसकता
जब तक वापस मुड़कर देखूँ
तब तक वह
अपने खप्पर में
छन्न की आवाज़ के संग
दुकानदार के फेंके सिक्के को-
चवन्नी-अठन्नी के-
लेकर आगे बढ़ गया होता
दुकान का सारा कार्य-व्यापार
चलता रहता पूर्व की तरह ही
ग्राहक सामान ख़रीदते रहते
दुकानदार की
बिक्री जारी रहती बदस्तूर
और मैं छलाँग लगाकर बाहर
उसकी पाने एक झलक
निकलता फिर
किन्तु काली माँ की तरह
झलक अपनी एक दिखाकर ही
इस दृश्यमान जगत से जो
पहले ही
ओझल होता
मध्ययुगीन योद्धा कभी
कभी सिपाही
कभी सैनिक
कभी गुण्डा
कभी नेता
और कभी कभी तो रूप भिखारी के धरे
दीख पड़ता वह!
एक दिन साधु के वेश में,
अगले दिन खूंखार जल्लाद!
एक दिन तो सचमुच ही कमाल हुआ
प्रकट हुआ जब वह एक सिपाही के रूप में
नज़र आया करता हुआ वकालत
शिक्षा का स्तर सुधारने की!
एक दिन मदारी,
एक और दिन जादूगर,
और कभी अफसर भी!
जादू!
ओह, यह सब कुछ
जादू नहीं तो और क्या था?
एक दिन वह ईश्वर की तरह और
घोषणा करते हुऐ
कि ‘अधर्म बढ़ गया है इस कदर
अब उसने ले लिया है अवतार
और धरती
जल्दी ही पापमुक्त होगी!’
कभी वह रिश्वत लेता हुआ नज़र आया,
कभी घूस देता हुआ!
आख़िर एक बार
जब कई दिनों तक
उसका हुनर नहीं हुआ सार्वजनिक
तो मैंने उसकी ख़बर ली
ज्ञात हुआ
उसका अन्तिम रूप एक डाकू था
जो इतना सच्चा था
देश और समाज में श्वेत-शफ़्फ़ाक
कपड़ों में विचरण करते हुऐ
अनगिनत डाकुओं के बीच भी
पुलिस ने अपनी क्राइम फाइल को करने दुरुस्त
पहचानने में नहीं उसे भूल की
औ’ खिलौना पिस्तौल वाले तथाकथित डाकुओं के बीच
मार गिराया उसे
दिन के उजाले में
एक मुठभेड़ में
और इस दुर्दांत ‘दस्यु’ पर घोषित
लाखों रुपये का इनाम पाने को
अलग-अलग प्रान्तों की पुलिस के विरोधी गुटों में
मची मारकाट!
इस तरह अपनी मुक्ति के साथ ही
तरह-तरह के भेस धर
गुज़र-बसर करते हुऐ
अप्रतिम उस कलाकार को
आख़िर मिल ही गया
अपनी विलक्षण कला के लिऐ
जीवन का
सबसे बड़ा
पुरस्कार!
