बदरी
बदरी
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तुम धूप में निकली बदरी मन को
हर्षाने आ गयी,
प्रेम स्नेह शश्वत वैभव का खेल
दिखाने आ गयी
मुझे देखकर ओढ़ो से गगरी यूं
छलकाने लगी
धीरे धीरे तन मन को बूंदों से
हर्षाने लगी
तुम शाम को डूबती नैया कल कल
बहती नदिया
कूल पर ठहरी प्रहरिया और उठकर
शाम चिराईया सतत शाम ढलती है
कुछ तो मन से कहती है
ओ बादल कि सोन चिराईया तुम धूप में
निकली बदरिया
