बाबुल का घर
बाबुल का घर
पिता ने कहा परी जिसे,
आसमान में उड़ने के लिए दिए पर,
आज वो जा रही है छोड़कर बाबुल का घर।
अपनी परी को खुद से दूर जाने की जो ना कर सके कल्पना,
आज वो जुदा कर रहा है जिगर का टुकड़ा अपना।
पूरे किये बचपन में जिसके सपने हर,
आज वो जा रही है छोड़कर बाबुल का घर।
जिस गुड़िया में बस्ती थी उसकी जान,
आज करना पढ़ रहा है उसका कन्यादान।
जो कभी थी पिता की नन्ही परी,
दुल्हन के भेस में श्रृंगार कर वह खड़ी,
उसकी विदाई की है ये सबसे कठिन घड़ी।
छोटे-छोटे फैसले जो खुद न ले पाती थी,
देखो वो करने जा रही है शुरू जिन्दगी का नया सफर।
देखो ना वो जा रही है छोड़कर बाबुल का घर।
उसके चेहरे पर देख मुस्कान,
भूल जाता था पिता अपनी सारी थकान।
ये मुस्कान बरकरार रहे, बस इतनी सी भी उस पिता की ख्वाहिश,
पर उसे जाता देख आज, हो गयी आँसुओं की बारिश।
साथ निभाया जिसका पूरी उमर,
आज वो जा रही है छोड़कर बाबुल का घर।
बहुत कठिन होती है ये जिन्दगी की डगर,
अगर साथ न हो एक अच्छा सा हमसफ़र,
इसलिए हर लड़की को छोड़ना पड़ता है बाबुल का घर,
शुरू करना पड़ता है जिन्दगी का नया सफर।
