अनकही
अनकही
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अनकही
उम्र जब बढ जाती
बुढापा दबे पाव आता है
उम्र के साथ साथ
तजुर्बा भी बढ जाता है
ना सहन होती कभी
किसी की भी बात
हर बात पर बिगडता
अनकही कोई बात
सबको देना चाहीये
बस अपनी तरफ ध्यान
मेरे पास ही है
हर एक बात का ज्ञान
अनकही अनसुनी
बात अगर कोई होती है
बुढापे की सनक
देखो युं ही बढ जाती है
