अल्फ़ाज़-ए-इश्क़
अल्फ़ाज़-ए-इश्क़
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उसकी जान कोई और था, मैं उसे अपनी जान मानता रहा,
उसे भी मुझ से मोहब्बत है, उसकी ये बात मानता रहा।
उसकी हरेक ग़ज़ल में, मैं ख़ुद को तलाशता रहा,
उसकी हरेक हर्फ़ में उसकी जान को झांकता रहा।
ताउम्र उसके साथ बिताने का, ख्वाब मैं सजाता रहा,
गुलाब के चक्कर में, मैं कांटों से इश्क़ लड़ाता रहा।
सादगी तो देखो हमारी, सच्चाई जान कर भी अनजान रहा,
उसकी झूठी फरेबी वायदों के पीछे भागता रहा।
