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" बापू -- बकरी  और  बंदर "
" बापू -- बकरी और बंदर "
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© Anupam Tripathi

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" बापू -- बकरी  और  बंदर "

आज व्यवस्था " गूंगी " है

सत्ता .............." बहरी "

और न्याय ........."अंधा"

 

 

शायद ;   आप  जानते  होंगे !

आजादी से पहिले;गुलाम भारत में

एक गाँधीजी रहा करते थे .........

: लोग उन्हें प्यार से, "बापू कहा करते थे".

बापू के पास एक अदद बकरी थी

और थे तीन प्यारे बंदर .

 

बकरी :  रागात्मक  थी

बन्दर  :  भावात्मक थे

 

वे जहाँ भी जाते; बकरी को साथ लिए जाते

बन्दर : खुद-ब-खुद; पीछे -पीछे चले आते

चारों  को  ही  बापू ने  बडे  जतन से  पाला

खुद बकरी का दूध पीया-बंदरों को सम्हाला

चरखा कातते रहे ......

अहिंसा बाँटते रहे.......

अंग्रेज -सरकार ; गांधीजी से बहुत घबराती थी

"गोल-गोलमेज"पर; टेढी-मेढी बातचीत के लिए

बार--बार बुलाती थी

लाठी--लंगोटी लेकर बापू ;"लंदन" तक जाते थे

नमक बनाते थे.........

राम-धुन गाते थे.......

 

बकरी से बापू ने सीखा -------

:  कड़वा  खा कर  मीठा  परोसना

मगर ; बंदर तो बंदर ही थे,जनाब !

उनका काम था ;  परस्पर  कोसना

बकरी पर बापू ने सारा स्नेह लुटाया

बंदरों को सामुहिक अनशन करना सिखाया

बकरी और  बंदर  मुस्तैद  थे

अपने-अपने दायरे में कैद थे .

 

वक्तव्य -----( यह वह समय था ; जब देश स्वतंत्रता की अग्नि -परीक्षा से गुजर रहा था ।नेता; जनता के आदर्श हुआ करते थे , उनके इशारे --- मात्र पर   जनता  अपना  सर्वस्य न्यौछावर करने हेतु तत्पर रहती थी।14-15 अगस्त 1947 की मध्य--रात्रि में आजादी  का सूर्य उदित हुआ।राजनीतिक महत्वाकांक्षा और सत्ता -लिप्सा के बीच बापू की नृशंस हत्या कर दी गई। फिर;  उस " बेचारी बकरी " और  उन तीनों बंदरों का क्या हुआ ? जानना चाहेंगे आप!

 

एक लंगोटी--लाठीवाला ; बना भावना आजादी की ।
कम पहनी पर रखी थी उसने ;  सचमुच इज्जत खादी की।।
आज सिल्क के सूट पहनकर;बगूले सारे इतराते |
ये  लोकतंत्र !  धृतराष्ट्र  की सत्ता ;   कौन  सुने फरियादी की ।।

 

अब याद आया ; मैं किसकी बात कर रहा हूँ ?

माफ़ करना दोस्तों ! यही कहते हुए डर रहा हूँ

क्योंकि ;गांधी को तो हमने आजादी के साथ ही खो दिया

समूचा " गांधी --दर्शन "; आँसूओं में डुबो दिया

खुद "बकरी" को आत्मसात् किया................

,.,.........और बंदरों को कुर्सियों पर "बो" दिया.

 

आज व्यवस्था " गूंगी " है

सत्ता .............." बहरी "

और न्याय ........."अंधा"

 

बकरी  :    भूख़ से  बे--हाल  है

राजनीति  है--- बंदरों का धंधा.

बापू के तीनों बंदर; आपस में मिल-जुलकर

भूखे  भारत  के  पिचके  पेट  पर

विकास का सुनहरा नक्शा बनाते हैं

हकीकत के  बदनुमा दाग मिटाते हैं

और ----------------------

चंदे की कमाई का ईमानदारी से बंटवारा कर

रातोंरात  चमत्कारी  बन  जाते हैं .

बकरी ----------- अभाव में जीती है।

समभाव से ---------- दर्द पीती है ।।

 

(जनता का दर्द जनता ही जानती है

राज-नीति  सिर्फ रोटियां सेंकती है)

 

वह देखती है;विकास की गंगा पर बनता हुआ

भ्रष्टाचार का बे----------- मिसाल  :   पुल

उखडी सड़क ------------- बिजली  गुल

मुस्कुराता कौवा --------- उदास बुलबुल

बकरी की उम्मीदों की झोली ..................

" कल भी खाली थी --- आज भी रीती है "

:  उदास लोकतंत्र की यही तो परिणिति है.

कि;अब यहाँ मूल्यों पर आधारित राजनीति नहीं होती

----------- : राजनेताओं के मूल्य तय हैं

सारी जनप्रतिनिधि-सभायें....................

.......................... राजनीतिक -- हरम हैं

इसीलिए तो बापू !  आज के नेता की कीमत

आपके बनाये हुए   :   नमक से भी कम है

(नेपथ्य से)...................................

" जब गुलामी गूंजती थी ; तब लहू का जोर था।

अब है पानी-धमनियों में;शोर है-कमजोर का।।

इस कदर मांझी; सफीने को,  डुबोने पर तुले हैं ।

झुक गए मस्तूल--- तूफां भी उठा है जोर का।।

.

आज के दौर में ;  बापू के तीनों बंदर

ग़जब  का  " सामन्जस्य" जी  रहे  हैं

बकरी  को "  साधन  "  मान  कर

उसका लहू पी रहे हैं ...............

बकरी  :     दर्द  से  मिमियाती  है

देश ---- भक्ति  का  राग  गाती  है

उसकी -- निरीहता-- सिध्द -- है

" बंदरों का न्याय भी तो प्रसिद्ध है".

 

मिमियाना ------बकरी का स्थाई भाव है ।

उद्दण्डता------- बंदरों का स्व-- भाव है ।।

 

परिदृश्य---------(तिरंगे में तीन रंग होते हैं । केसरिया--शौर्य का प्रतीक ; सफेद--शांति/अहिंसा का प्रतीक तथा हरा --समृध्दि और खुशहाली एवं"अशोक चक्र"-निरंतर विकास का प्रतीक एवं इसके एक ओर "घोडा"-- तेजी तथा दुसरी ओर " बैल "- कर्मठता/बल का प्रतीक )

 

देखिए ! -----------------------------

बापू के तीनों बंदर " तिरंगे के रंगों"से खेल रहे हैं

माँ-भारती को राजनीति के गहरे "दल--दल" में ढकेल रहे हैं .

"कामचोर बैल" और " निरंकुश घोड़े  " के मध्य

शांति-पथ पर"प्रगति का चक्र";औंधे मुँह पडा है

हर बेईमान माथे पर ;"सत्यमेव जयते" जडा है

"गांधी " !  आज भी ; हर सड़क --- चौराहे पर

ला---- वा----रि----स ;   तनहा  खड़ा  है.

 

बकरी................. बापू  की  दुहाई  देती है

उद्दण्ड बंदरों के बीच ...........................

अनमनी--अभिशप्त अहिल्या--सी रहती है.

बंदर ----- निरंकुश हैं ; अपने-आप में खुश हैं

बंदर--सत्ता का और बकरी;जनता का प्रतीक है

शायद ! दोनों के लिए ही यह व्यवस्था

बढिया है --------------- ठीक है.

 

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