Rekha Joshi

Others


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सपनों का संसार

सपनों का संसार

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”सपनों की दुनिया भी कितनी अजीब होती है, सपने में सपना जैसा कुछ लगता ही नही, बिलकुल ऐसा महसूस होता है जैसे सब सचमुच में घटित हो रहा हो, उफ़, कितना भयानक सपना था, अच्छा हुआ नींद खुल गई ”डरी हुई सीमा बिस्तर छोड़, बाथरूम में जा कर मुहं धोने लगी, उसके सीने में अभी भी दिल जोर जोर से धडक रहा था और सांस फूली हुई थी।

अक्सर हम सब के साथ ऐसा ही कुछ होता है जब भी हम कभी कुछ ऐसा ही भयानक सा सपना देखतें है, और जब कभी बढ़िया स्वप्न आता है तो नींद से जागने की इच्छा ही नहीं होती,

हम जाग कर भी आँखे मूंदे उसका आनंद लेते रहते है। सीमा बार बार उसी सपने के बारे में सोचने लगी, तभी उसे अपनी साइकालोजी की टीचर की क्लास याद आ गई, जब वह बी .एड कर रही थी, सपनो पर चर्चा चल रही थी,”हमारी जागृत अवस्था में हमारे मस्तिष्क में लगातार विभिन्न विभिन्न विचारों का प्रवाह चलता रहता है, और जब हम निंदिया देवी की गोद में चले जातें तो वह सारे विचार आपस में ठीक वैसे ही उलझ जाते है जैसे अगर ऊन के बहुत से धागों को हम इकट्ठा कर एक स्थान पर रख दें और बहुत दिनों बाद देखें तो हमें वह सारे धागे आपस में उलझे हुए मिलें गे, ठीक वैसे ही जब हम सो जाते है हमारे सुप्त मस्तिष्क के अवचेतन भाग में वह उलझे हुए विचार एक नयी ही रचना का सृजन कर स्वप्न का रूप ले कर हमारे मानस पटल पर चलचित्र की भांति दिखाई देते है l

फ्रयूड के अनुसार हम अपनी अतृप्त एवं अधूरी इच्छायों की पूर्ति सपनो के माध्यम से करते है, लेकिन दुनियां में कई बड़े बड़े आविष्कारों का जन्म सपनो में ही हुआ है, जैसे की साइंसदान कैकुले ने छ सांपो को एक दूसरे की पूंछ अपने मूंह में लिए हुए देखा,और बेन्जीन का फार्मूला पूरी दुनिया को दिया।

अनेकों साईकालोजिस्ट्स ने सपनो की इस दुनिया में झाँकने की कोशिश की, लेकिन इस रहस्यमयी दुनिया को जितना भी समझने की कोशिश की जाती रही है, उतनी ही ज्यादा यह उलझाती रही है।

हमें सपने क्यों आते है ? कई बार सपने आते है और हम उन्हें भूल जातें है ? हमारी वास्तविक दुनिया में सपनो का कोई योगदान है भी या नहीं, और कई बार तो हमारे सपने सच भी हो जाते है। अनगिनत सवालों में एक पहलू यह भी है, जब हम सो जाते है तब हमारा जागृत मस्तिष्क आराम की स्थिति में चला जाता है और उस समय मस्तिष्क तरंगों का कम्पन जिसे फ्रिक्युंसी कहते है, जागृत अवस्था की मस्तिष्क तरंगो की अपेक्षा घट कर आधी रह जाती है, उस समय हमारी बंद आँखों की पुतलिया घूमने लगती है जिसे आर ई एम् कहते है, मस्तिष्क की इसी स्थिति में हमे सपने दिखाई देते है 

एक मजेदार बात यह भी उभर के आई कि जब हम ध्यान की अवस्था में होते है तो उस समय भी मस्तिष्क तरंगों की कम्पन कम हो जाती है और हम जागृत अवस्था में भी आर ई एम की अवस्था में पहुंच सकते है, अगर उस समय हम जागते हुए भी कोई सपना देखते है तो उसे हम पूरा कर सकते है। सीमा के मस्तिष्क में भी अनेको विचार घूम रहे थे और वह बिस्तर पर लेट कर ध्यान लगाने की कोशिश कर रही थी ताकि वह भी अपने सपनो को सच होते देख सके।


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