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DrGyanchand Jangid Advo

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राहगीर

राहगीर

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राहगीर को तो अपनी राह पर चलते रहना है 


एक वह दौर था जमाना था बचपन का जब स्कूल में पढ़ा करते थे तब गुरु जी हमें गाय पर निबंध/कहानी लिखने को कहा करते थे, वह निबंध /कहानियां पूर्णतया काल्पनिक हुआ करते थे। बड़ा अजीब वक्त था अब कैसा वक्त आ गया हमें एक कुत्ते पर निबंध /कहानी लिखनी पड़ रही है। यह भी पूर्णतया उस प्रकार काल्पनिक है जिस प्रकार मेमना ओर भेड़िया चालाक लोमड़ी, शेर चूहा की कहानी है बता दूँ इस कहानी का किसी से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कोई संबंध नहीं है न किसी कुत्ते से और न किसी कुत्ते पालने वाले से ये पूर्णतया काल्पनिक है

   

अक्सर सुना है, बचपन से सुनते भी आ रहे हैं कि कुत्ता सबसे अधिक वफादार जानवर होता है चलो मान लेते हैं आपकी बात और कहावत को भी कि कुत्ते सबसे अधिक वफादार होते है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह कुत्ता किस कैटेगरी का है क्योंकि सामान्यतया कुत्ते दो प्रजाति के होते हैप्रजाति का मतलब यहां पर नस्ल से नहीं यहां पर तात्पर्य यह कि वह कुत्ता किसी का पालतू कुत्ता है या आवारा केटेगरी का कुत्ता

 

अब जो बात वफ़ादारी की की जाती है पालतू कुत्ते से तो अपेक्षा की जा सकती है वह वफादार होता भी है, लेकिन एक आवारा कुत्ता जो गली गली में घूमता फिरता रहता है मुँह मारता रहता है, न उसमे अपने मालिक के सिखाये हुए संस्कार होते है न कोई सलीक़ा जिसका कोई वजूद नहीं है होंगे भी कैसे आखिर आवारा जो रहा उससे क्या अपेक्षा करें  

 

अब राह चलते एक राहगीर को एक कुत्ता गले पड़ गया था हर रोज रोज अपनी दुम हिलाते हुए उस राहगीर के तलवे चाटना शुरु कर देता था। यह दौर काफी समय तक चलता रहा आखिर में उस राहगीर ने उस पर तरस खाकर उस पर विश्वास करके उसे कुछ  खाने को डालना शुरू कर दिया, धीरे धीरे आवारा कुत्ते को थोड़ी अहमियत मिल गई दिन ब दिन उसके नखरे शुरू हो गए। चलो कोई बात नहीं कुत्ता है नखरे तो करेगा राहगीर उसके नखरे सहन करता गया लेकिन दिन ब दिन उसके नखरे बढ़ते ही गये आखिर कब तक उसके नखरों को सहन किया जाए 

 एक दिन राहगीर ने उसके नखरों को सहन करना क्या बंद कर दिया उसने भौंकना ही शुरु कर दिया, एक दिन तो ग़जब हो गया काटने को दौड़ पड़ा । भौंकेगा और काटने को भी दौड़ेगा क्यो नहीं आखिर वह भी कुत्ता था और वह भी आवारा अपनी जात पर आना ही था


अब एक कहावत ऐसी भी सुनी है खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे ये कहावत चरितार्थ हो रही थी वह आवारा कुत्ता खंबा नोच नोच कर थक गया अब कहीं जाता कीचड़ में डूबकी लगाकर आता और फड़ फड़ कर के अपने दामन के छींटे उछालने का प्रयास करता, अब उनको कौन समझाए जिनके छीटे लगेंगे वह तो धुल जाएंगे छीटे कपड़ों पर है दामन पर नहीं लेकिन उसका तो पूरा दामन ही दलदल में है दूसरों पर कीचड़ उछालने के लिए दलदल में डुबकियां लगाने के बजाय अगर वह किसी पवित्र तालाब में जाकर डुबकी लगाए तो शायद उसके पाप धुल जाए 


कहां जाता है कि पागल कुत्ते को गोली मार दी जाती है, लेकिन नहीं कुत्ते को मारने का पाप नहीं लेना चाहिए उसे कुत्ते के जमारे में उसी दलदल में डुबकी लगाने के लिए पागल कुत्ते को पागल ही बना रहा कर घूमने देना चाहिए, क्योंकि ऊपर वाले ने जो कर्मो में यही लिखा हैं उसकी नियति ही ऐसी है उसका फल तो भोगना ही पड़ेगा उसे।


अब राहगीर का क्या वह तो कल भी सीना तान कर गलियों से निकला करते थे और आज भी कल भी ऐसी तरह निकलेंगे, भौंकने वाले तो भौंकेंगे उसकी नियति ही ऐसी है राहगीर को तो बस अपनी नैतिक राह पर चलते रहना है आगे बढ़ते रहना है।


"न किसी के प्रभाव में जियो 

न किसी अभाव में जियो 

यह जिंदगी है आपकी अपनी 

इसे अपने स्वभाव से जियो"



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